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स्व चिंतन, आत्म चिंतन - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
स्व चिंतन, आत्म चिंतन

स्व चिंतन, आत्म चिंतन

सच क्या है

स्वचिंतन, आत्मचिंतन, स्वनिरीक्षण। स्वचिंतन अर्थात् स्व+चिंतन। खुद (आत्मा) का चिंतन, मनन और अवलोकन। चिंतन की गहराई और एकात्मता जितनी सूक्ष्म होगी, विचारों रूपी अमृत उतना गहराई पूर्ण और अनुभव युक्त होगा। एकांत और एकाग्रता इसकी पहली शर्त है। आध्यात्म पथ के राही के लिए स्वचिंतन प्राणवायु की तरह है। कितने ही वेद, ग्रंथ, शास्त्रों का अध्ययन कर लिया जाए लेकिन ज्ञान अमृत तभी निकलेगा जब स्वचिंतन रूपी मथानी चलेगी। स्वचिंतन की धारा जितनी गहरी होती जाएगी तो मन में रचनात्मक और सृजनात्मक विचारों की धारा भी उतनी प्रबल होती जाएगी।
स्वचिंतन ही वह जरिया है जिसमें हम अपनी सूक्ष्म कमजोरियों को पहचान कर उन्हें खुद से आजाद कर सकते हैं। क्योंकि जब स्व पर केंद्रित होकर जीवन के समुचित पहलुओं पर नजर दौड़ाते हैं तो हमें उन स्याह पहलुओं का भी आभास हो पाता है कि कैसे जीवन की रेल दौड़ती जा रही थी और हम उन पर सवार होकर जाने-अनजाने में यूं ही चले जा रहे थे। इससे सकारात्मक और नकारात्मक पहलु नजर आते हैं। बदलाव की शुरुआत का केंद्र बिंदू भी यहीं से होकर गुजरता है। चिंतन की धारा का प्रवाह तभी मोड़ा जा सकता है जब उसके समुचित आयामों पर काम किया गया हो, सूक्ष्म से सूक्ष्म विचारों की सर्जरी कर स्याह परतें हटाईं गई हों। यह एक सतत् प्रक्रिया है जो विकास के क्रम में जारी रहती है। जितने महान विचार, उतना चिंतन श्रेष्ठ।
कमजोर पक्ष को बना सकते हैं मजबूत
कुछ लोगों के निर्णय व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पर सही नहीं होने के बाद भी वह उसे सही ठहराते हैं। यह स्थिति तभी बनती है जब व्यक्ति स्वचिंतन से विमुख हो। बड़ी-बड़ी शख्सियतों के उद्बोधन सुनकर मुख से वाह..वाह निकालते हैं। लेकिन जब वह कर्म में आते हैं तो उनके जीवन में तालमेल (विचार और कर्म) नजर नहीं आता है? लोग कहते हैं अमुख काम में मन नहीं लगता। अमुख विषय कठिन लगता है या इस बात के कारण ही मेरी सफलता रुकी है। यही वह समय होता है जब हम कमजोर पक्ष को स्वचिंतन से मजबूत पक्ष में बदल सकते हैं। खुद से जुड़ी हर समस्या का समाधान खुद के ही पास है। अब ये खुद पर निर्भर है कि उसका समाधान कब, कैसे और किस विधि से निकाला जाए? हमें खुद की मदद, खुद करना सीखना होगा, तभी परमात्म मदद की भी प्राप्ति होगी।
परमात्म चिंतन की ओर…
आध्यात्म का आधार ही है परमात्म चिंतन, शुभ चिंतन, श्रेष्ठ चिंतन और महान चिंतन है। आध्यात्म सिखाता है कि आज जो गलती या त्रुटि हुई है वह दोबारा न हो। स्वचिंतन की धारा जब एकाकार हो जाती है तो परमात्म चिंतन से आत्मा में नई ऊर्जा और शक्ति भर जाती है। स्वचिंतन रूपी मथानी से जब आत्मा के सभी जाले (कमी-कमजोरियां) हट जाते हैं तो फिर परमात्म चिंतन में एकाग्रता के साथ एकरूपता आती है। इस अनहद नाद की अनुभूति इसमें रमने वाला ही कर सकता है। परमात्म चिंतन में रमा साधक सुख-दु:ख, सम-विषम, लाभ-हानि और जय-पराजय की स्थिति में एकभाव लिए निरंतर जीवन पथ पर बढ़ता जाता है। क्योंकि जिसका मन और आत्मा परमात्म चिंतन में मनन हो जाती है उसे पाने और खोने के लिए कुछ शेष रह नहीं जाता है। जीवन की पूर्णता परमात्म प्यार की डोर ही है।

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