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शरीर की तरह आत्मा का ध्यान रखना जरूरी - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
शरीर की तरह आत्मा का ध्यान रखना जरूरी

शरीर की तरह आत्मा का ध्यान रखना जरूरी

जीवन-प्रबंधन

शिव आमंत्रण आबू रोड । जीवन में हम बहुत सी चीजें देखते हैं और उनसे बहुत कुछ प्राप्त भी करते हैं। हमारे कई सपने होते है जो जीवन से जुड़े होते हैं, परिवार से जुड़े होते हैं, बच्चों से जुड़े होते हैं, अपने कैरियर को लेकर के होते हैं, उन्हें प्राप्त करते जाते हैं। हर प्राप्ति हमें कहीं न कहीं संतुष्टि अवश्य देती है और हमें खुशी का एहसास कराती है। हमारी खुशी दूसरी अन्य चीजों पर डिपेंड हो जाती है। खुशी कहीं न कहीं मिलती है, फिर चली जाती है, फिर मिलती है और फिर चली जाती है। सारे दिन में हमारे सामने कई परिस्थितियां आती है। सारा दिन क्या है? यह परिस्थितियों की एक श्रृंखला है जो लगातार चलती ही रहती है, जैसे कि कोई फिल्म चल रही हो। एक दृश्य के बाद दूसरा दृश्य आता है, कोई दृश्य मेरे पक्ष में होगा तो कोई नहीं होगा। इसी प्रकार कोई व्यक्ति मेरे पक्ष में होगा, कोई नहीं होगा। अर्थात् जैसे मैं चाहती हूं वैसे, कोई चलेगा और कोई नहीं भी चलेगा। इसका मुख्य कारण यही है कि हमारी खुशी व्यक्ति और लोगों के ऊपर निर्भर कर रही है। इसीलिए खुशी मिलती है, फिर चली जाती है। अर्थात् एक दृश्य आया बहुत अच्छा, बच्चे समय पर सुबह उठ गए, तैयार भी हो गए और स्कूल चले भी गये तो इससे मुझे खुशी मिली। दूसरा दृश्य आया कि बच्चे समय पर तैयार तो हो गए, लेकिन उनको लेने के लिए बस ही नहीं आयी तो मुझे गाड़ी से छोडऩे के लिए जल्दी-जल्दी जाना पड़ा।
पहले वाले दृश्य में खुशी थी लेकिन दूसरे दृश्य में खुशी गायब हो गई। फिर अगला दृश्य आता है कि समय पर फिर भी स्कूल में पहुंच तो गए, बहुत अच्छा। लेकिन अगला दृश्य पहुंचते ही याद आया कि जो गृहकार्य किया था वो नोट बुक तो घर पर ही रह गई। ये सारे ऐसे दृश्य हैं जो मेरे मानसिक संतुलन पर प्रभाव डालते है। क्योंकि मैंने अपने मन का नियंत्रण पूरी तरह से परिस्थितियों के हाथ में दिया हुआ है। तब मैंने सोचा कि ये सब तो स्वभाविक ही है कि जैसे-जैसे परिस्थिति और लोग बदलते जायेंगे, मेरी सोच, मेरी अनुभूति उस अनुसार बदलती जायेगी। इसलिए हमें कभी खुशी मिलती है तो कभी गम मिलता है और हम उसको स्वीकार कर लेते हैं, यह कैसा जीवन है?
हम अपने मन की शक्ति को परिस्थितियों को देते गये, देते गये, परिस्थितियाँ दिन-प्रतिदिन चुनौती पूर्ण होती गयी। कभी अनुकूल, कभी अशांति का जो प्रतिशत था वह बढ़ता गया। जिसके कारण हमारे जीवन में स्थिरता कम और अशांति ज्यादा हो गयी। फिर हमने अपने जीवन में देखना शुरू किया कि हमारा जीवन कहां है? तब हम अपने आप से प्रश्न पूछना प्रारंभ करते हैं कि सब कुछ तो हो रहा है, सब कुछ तो यहां है, एक अच्छा पति, एक अच्छी पत्नी, दोनों नौकरी में हैं, अच्छा-खासा मासिक वेतन घर में आ रहा है, 35 वर्ष की आयु में ही मेरा दो मंजिला मकान बन चुका है, बाहर दोनों के लिए अलग-अलग गाडिय़ां खड़ी हैं, बच्चों के लिए अलग, फिर भी हम खुश क्यों नहीं हैं? अब इससे ज्यादा और क्या चाहिए? लेकिन फिर भी अंदर में थोड़ा सा खालीपन है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हमारी खुशी कहाँ है?

भावनात्मक स्वास्थ्य रहना जरूरी
हम अपनी खुशी को थोड़ी देर के लिए छोड़ देते हैं। कई तरह के परिस्थितियों को संभालने के लिए शारीरिक शक्ति भी चाहिए। आज यदि मैं बीमार हूं तो यह प्रश्न ही नहीं उठता है कि मैं गाड़ी चलाकर जाऊंगी। जब हम अपने जीवन में सभी परिस्थितियों को संभालते हैं तो क्या कभी हमारे मन में यह प्रश्न उठा कि पहले मैं अपनी शारीरिक क्षमता को या परिस्थिति को संभालू? तो जवाब मिलता है कि शारीरिक क्षमता के प्रति कुछ नहीं सोचना है, मुझे तो परिस्थिति पर ही सारा ध्यान केंद्रित करना है। मुझे यह पता है कि मैं शारीरिक क्षमता से ही परिस्थिति को हैंडल कर सकती हूं। यदि मैं बीमार हूं तो काम पर कौन जायेगा, फिर वहां काम क्या होगा ये दूसरी बात है। पहली बात यह है कि मैं ऑफिस जाऊंगी कैसे? इसलिए सारे दिन में मैं अपने शरीर का ध्यान जरूर रखती हूं। इसके लिए हमें शरीर को समय पर भोजन भी देना चाहिए। आप एक दिन भोजन छोड़ देगें, दो दिन छोड़ देंगे, लेकिन कितने दिन तक छोड़ेंगे! मान लीजिए आप भागते भागते भी खा रहे हैं और जंक फूड भी खा रहे हैं लेकिन आप खा तो लेते हो। चलो, आपने उपवास भी किया लेकिन कितने दिनों तक उपवास करेंगे? फिर उसके बाद आपको भोजन खाना ही पड़ेगा। क्योंकि आपको मालूम है कि ये चार दिन का जीवन नहीं है। यह तो एक लम्बी यात्रा है, इस यात्रा में जीवित रहने के लिए और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भोजन जरूरी है, नहीं तो आपका जीवन खत्म हो जायेगा। यदि हमारा स्वास्थ्य अच्छा होगा, तभी हम ठीक तरह से काम कर पायेंगे।
लेकिन कहीं न कहीं हमने भावनात्मक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य से अलग कर दिया है। अगर उसको भी हम जीवन में उतनी ही प्राथमिकता दें जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य को देते हैं तब हम जीवन की यात्रा में ठीक तरह से चल पायेंगे। एक है शारीरिक रूप से शक्तिहीन होना और एक है भावनात्मक रूप से शक्तिहीन होना। अब पांच मिनट पहले पता चला कि स्कूल छोडऩे जाना है, ठीक है। अगर मैं उस समय शांत रहूं, स्थिर रहूं, छोडऩे तो फिर भी जाना ही है, गाड़ी तो आपको फिर भी चलानी ही है। लेकिन गाड़ी हम किस स्थिति में चलायेंगे? दु:खी होकर? अगर हम भावनात्मक स्वास्थ्य को भी उतना ही महत्व दें कि ये सब परिस्थितियां और भावनात्मक स्वास्थ्य अलग-अलग नहीं है। यह तो एक प्रक्रिया है। यदि मैं भावनात्मक रूप से स्वस्थ हूं तो परिस्थितियों को बहुत ही सरलता से पार कर सकती हूं। पहले हम क्या करते हैं, परिस्थिति को संभालने के बारे में सोचते हैं जो बाद में भावनात्मक स्वास्थ्य के बारे में सोचते हैं।

हमने आत्मा का ध्यान ही नहीं रखा
अभी लोग शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में इतना क्यों सोच रहे हैं? क्यों इतना ध्यान रखा जा रहा है? इसके लिए हमें बहुत ज्यादा पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है। हम सिर्फ एक पीढ़ी पीछे जाते हैं और सिर्फ अपने पैरेंट्स को देखते हैं। वे कभी व्यायाम करने नहीं गये, उन्होंने कभी मिनरल वाटर नहीं पीया, उस समय भोजन का इतना ध्यान नहीं रखा जाता था, हम लोगों के यहां साधारण भोजन बनता था उसे ही सभी लोग खुशी-खुशी खाते थे। आज हमारे स्वास्थ्य पर इतना ध्यान क्यों दिया जा रहा है? क्योंकि भावनात्मक दवाब इतना ज्यादा है कि कोई न कोई समस्या शरीर के साथ चलती ही रहती है। इसका कारण यह है कि हमने आत्मा का ध्यान ही नहीं रखा, उसके कारण ही सारी समस्याएं आनी शुरू हो जाती है। अगर हम आत्मा का भी ध्यान रखें तो मन पर जो इतना ज्यादा दबाव है, इसके लिए मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
आप व्यायाम करने तो जा रहे हो, उसमें भी अगर दो-तीन लोग इक व्यायाम कर रहे हैं उस समय आप स्वयं को चेक जांचे करें कि हमारे सोच की गुणवत्ता क्या है? हम सेहत के लिए घूम रहे हैं लेकिन साथ-साथ नकारात्मक विचार उत्पन्न हो रहे हैं। इस थॉट्स (विचार) का असर सिर्फ हमारे मन पर ही नहीं बल्कि पूरे शरीर पर पड़ता है। जब तक हम यह महसूस नहीं करेंगे कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भावनात्मक स्वास्थ्य का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है तब तक हम स्थिर नहीं रह सकते हैं।

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