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अध्यात्म जगत की मैनेजमेंट गुरु बीके राजयोगिनी लक्ष्मी दीदी - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
अध्यात्म जगत की मैनेजमेंट गुरु बीके राजयोगिनी लक्ष्मी दीदी

अध्यात्म जगत की मैनेजमेंट गुरु बीके राजयोगिनी लक्ष्मी दीदी

आध्यात्मिक

शिव आमंत्रण आबू रोड/राजस्थान। इस धरा पर कुछ महान आत्माएं ऐसी भी होती हैं जिन पर भगवान भी नाज करते हैं। ब्रह्माकुमारीज़ की संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी लक्ष्मी (मुन्नी) दीदी अध्यात्म जगत में कुशल प्रबंधन की जीती-जागती मिसाल हैं। 15 अक्टूबर 1950 को जन्मी जीवन के 75 बसंत पूर्ण कर चुकीं लक्ष्मी दीदी उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी कुशाग्र बुद्धि और स्मरण शक्ति के लिए जानीं जाती हैं। ब्रह्माकुमारीज़ के मैनेजमेंट से लेकर व्यवस्थाओं के कुशल संचालन में आपका कोई सानी नहीं है। आपने अपना जीवन दधीचि ऋषि मिसल विश्व सेवा और विश्व कल्याण में झोंक दिया। इस उम्र में भी दिन-रात विश्व कल्याण का भाव और सेवा आपकी रग-रग में बसती है। शिव आमंत्रण के संपादक बीके कोमल से विशेष चर्चा में उन्होंने अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर किया, प्रस्तुत है विशेष साक्षात्कार……

देश का सबसे बड़ा औद्योगिक शहर कोलकाता आर्थिक के साथ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। मां दुर्गा की भक्ति में लीन इस शहर की अपनी विशेषता है। इसी शहर में बीके मुन्नी का जन्म एक धार्मिक पारायण परिवार में 15 अक्टूबर 1950 को हुआ। पांच वर्ष की आयु में ही मां का साथ छूट गया और ममता का साया सर से उठ गया। इसके बाद पिता की दूसरी शादी हुई जिससे छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के नाते मुझसे सबका बहुत लगाव और प्यार था। मैं बचपन से ही पवित्र जीना चाहती थी। सन्यासी बनकर घर में रहना चाहती थी। मेरी इच्छा ही नहीं थी कि मैं अपने परिवार से दूर जाऊं। इसलिए शादी का इरादा दूर-दूर तक नहीं था।
हमेशा क्लास में आती थीं प्रथम : बीके मुन्नी पढ़ाई में बहुत ही होशियार थी। इसलिए वे लंबे समय तक कई क्लास में मॉनीटर रही। क्लास में हमेशा प्रथम आती थीं। बचपन में इच्छा थी कि पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बनकर परिवार में ही रहकर सबकी सेवा करुं। ऐसा करने का ख्याल बाल्यकाल से ही आने लगा था। उन्होंने कहा कि मुझे अकेले में रहना पसन्द ही नहीं था, इसलिए संयुक्त परिवार में रहना चाहती थी।
पहली बार 1967 में ब्रह्मा बाबा सेमिलनेमाउण्ट आबू आई : चर्चा में बीके मुन्नी ने बताया कि एक दिन मैं पिता के साथ सेंटर पर पहुंची तो वहां का सुंदर वातावरण देखकर मुग्ध हो गई। तभी लाल बत्ती जलाकर मुझे योग में बिठाया गया। उस समय ऐसी अनुभूति हुई कि जिसे मैं ढूंढ रही थी वो यही दुनिया है। अब यही मेरा घर है यही मेरी दुनिया है। फिर मैं निर्मल शांता दादी से मिली उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया जो लगा मेरा यही घर है। मैं पहली बार 1967 में ब्रह्मा बाबा से मिलने माउण्ट आबू आई। बाबा के कमरे में झांकी, तभी बाबा ने बुला कर गोद में बिठा लिया। गोद में बिठाकर बाबा ने बहुत प्यार किया। बाबा ने पूछा बच्ची कितना पढ़ी हो आगे कितना पढ़ोगी। बाबा ने मुझसे बात किया कि मैं सोच में पड़ गई कि ये कौन हैं जो मेरे मन की बात कर रहे हैं। मैंने कहा इतना पढ़ी हूँ कि आपकी सेवा कर सकती हूँ और मुझे कुछ नहीं करना। फिर मेरा मन पढ़ाई से ऊबने लगा। बाबा से मिलने के बाद मैंने कहा कि बाबा इग्जाम देकर मैं फिर सेवा में आ जाऊंगी। फिर घर जाकर सफेद रंग के कपड़े पहनने प्रारम्भ कर दिए। यह मेरे चाचा को अच्छा नहीं लगा और वे जल्दी शादी कर देना चाहते थे। उसके बाद मैं साकार बाबा के पास 1968 में आई। प्रतिदिन मैं एक टाइम बाबा के साथ भोजन करती थी। 17 दिन रहने के बाद मेरे घर जाने का समय आ गया और फिर बाबा ने बोला बच्ची घर छोडक़र क्यों जा रही हो। मैंने कहा एक बार जा रही हूं फिर हमेशा
के लिए आऊंगी।

जन्म के साथ ही परिवार में एक नया सूर्योदय हुआकहते हैं कि जन्म लेने वाले अपने साथ अगले और पिछले जन्मों की उपलब्धियां लेकर आता है। ऐसा ही कुछ था बीके लक्ष्मी के साथ। बीके लक्ष्मी के पिता हिन्द मोटर्स में उन दिनों मैनेजर हुआ करते थे। लेकिन जैसे ही लक्ष्मी का जन्म हुआ पूरे परिवार में एक नया सूर्योदय हुआ। हिन्द मोटर्स से मैनेजेर की नौकरी छोड़ लोहे का कारोबार प्रारम्भ हुआ और देखते ही देखते यह कारोबार बड़ा होता गया और शहर के सुप्रसिद्ध व्यवसायी बन गए।इसके बाद ही उनके पिता ने नाम लक्ष्मी रखा।

दीदी का बचपन से ही था सन्यासी बनने का सपना :- मुझे ईश्वरीय ज्ञान भी पिताजी के द्वारा ही मिला। जब मैं छोटी थी तब हमारे पिताजी अपने दोस्त के घर जाते थे जो ब्रह्माकुमारीज़ से जुड़े हुए थे उन्होंने ही मेरे पिता जी को ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के बारे में बताया था। जब मेरे पिता सेवाकेन्द्र पर जाने लगे तो उन्होंने तत्कालीन सेवाकेन्द्र प्रभारी बीके भारती बहन (जो इस समय राजकोट में है) को मेरी विशेषताओं को बताते हुए कहा कि वह शादी नहीं करना चाहती और सन्यासी बनना चाहती है। तब भारती दीदी के कहने पर पिताजी सेवाकेन्द्र ले गए। उस समय मैं नौवीं क्लास में पढ़ती थी और मेरी उम्र 16 साल थी।

भंडारा संभालने का वरदान : जब मैं जाने लगी तो बाबा ने कहा कि सौगात लो मैंने मना किया तो बाबा ने कहा बाबा के घर से खाली नहीं जाते। फिर बाबा ने मुझे लच्छू दादी के साथ स्टॉक में भेजा और कहा जो चाहिए ले लो। मैं गई और सिर्फ एक रूमाल लेकर आई। फिर बाबा ने प्यार से गले लगाया। बाबा ने कहा बच्ची मधुबन में बाबा का भंडारा संभालेगी।

कागज और कलम से संभालती हैं पूरा मैनेजमेंट :- बीके मुन्नी बहन 75 वर्ष की उम्र में भी मस्तिष्क के मामले में एकदम यंग है। उन्हें कंप्यूटर का ज्ञान नहीं है लेकिन सब चीजें जबानी याद रहती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय आबू रोड में रहकर पूरे कार्यक्रमों का संचालन करती हैं। राजयोग ध्यान और अध्यात्म की शक्ति से सुपर कंप्यूटर की तरह काम करती हैं। आज भी वे 20 घंटे तक काम करने की क्षमता रखती हॅै। एक कागज और कलम से पूरे प्रबंधन को मैनेज करती हैं। यही प्रतिभा आपको सबसे अलग करती है।

दादी रोज गोद में लेकर पढ़ती थीं मुरली :- दादी की मूरत मां जैसी थी। दादी प्रतिदिन हमें रात को गोद में लेकर मुरली खुद पढ़ती और मुझे भी सुनाती थीं। कभी भी यदि कोई गलती हो जाती थी दादी ने कभी डांटा नहीं। जब कोई गलती दादी के सामने
हो जाती थी तो दादी कहती थीं मुन्नी ऐसे नहीं यह काम ऐसे होगा। उनका बोलने का ढंग यही था। 18 वर्ष की उम्र में रहने लगी है। अभी 50 साल पूरा हो गया। दादी इतना प्यार करती थीं कि मैं हमेशा ज्यादा समय उनके साथ ही बिताना चाहती थी।

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