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सृष्टि नाटक का नियम है जैसी करनी, वैसी भरनी - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
सृष्टि नाटक का नियम है जैसी करनी, वैसी भरनी

सृष्टि नाटक का नियम है जैसी करनी, वैसी भरनी

समस्या-समाधान

समय को संग्रह करने की विधि-कहते हैं समय शक्तिशाली और बहुमूल्य घटक है आखिर समय इतना बहुमूल्य क्यों है ? तीन विशेषताओं के कारण समय को बलवान माना जाता है। अन्य सभी खजानो को संग्रह या संचित करके रख सकते हैं ताकि आवश्यकता अनुसार उपयोग कर सकें, जैसे कि धन, धान्य, जल, ज्ञान, गुण आदि को। परंतु समय को संग्रह करना कल्पनातीत है। अन्य सर्व खजाने सृजनात्मक हैं। नष्ट हुई चीज को फिर से निर्माण कर सकते हैं लेकिन बीते हुए समय का फिर से सृजन असंभव है जो क्षण बिता वह सदा काल के लिए नष्ट हो गया। समय को रोक नहीं सकते हैं। कुछ अनहोनी हो रही है, सोचेंगे, समय को रोक ले लेकिन असाध्य है। इसीलिए इसको निरंतर कालचक्र कहते हैं और सभी इसी को नमन करते हैं। महापुरुषों ने समय के बारे में विविध रीति से अपने उद्गार व्यक्त किए हैं जैसे, जीवन माना ही समय, अगर समय को नष्ट कर रहे हैं तो समझो जीवन को नष्ट कर रहे हैं। एक प्रसिद्ध दार्शनिक ने कहा है कि विश्व में किसी को भी हम जीत सकते हैं लेकिन समय को नहीं। परंतु स्वयं परमात्मा ने समय को भी संग्रह करने की विधि सिखाई है। लोग समझते हैं कि धन चंचल है, कितना भी कमाओ, हाथ में ठहरता ही नहीं । इसीलिए दूरान्देशी लोग उस पैसे से सोना खरीद कर रख देते हैं अर्थात् धन को सोने में परिवर्तन करते हैं। जब कोई आपत्ति आती है ऐसा समय आता है जहां अपार धन राशि की जरूरत पड़ती है तब फिर से उस सोने को धन में परिवर्तन कर समस्या का समाधान कर देते हैं। वैसे ही, परमपिता परमात्मा ने समय को पुण्य में परिवर्तन करने की एक अनोखी विधि सिखाईं है। सृष्टि नाटक का नियम है कि जैसी करनी वैसी भरनी। सुकर्म ही प्रारब्ध है सुख, शांति, संपत्ति और विकर्म या पाप का फल है दुख, अशांति,अभाव। पुण्य अर्थात् सुकर्म का फल। जिस समय हम सुकर्म करते हैं उस समय हमारा पुण्य संग्रह होता है अर्थात् समय पुण्य में परिवर्तित हो जाता है जितना अधिक सुकर्म उतना ही अधिक पुण्य का संग्रह। इस संग्रहित पुण्य के बल से भविष्य में पुन: सुहावना या अनुकूल समय मिल जाता है। इससे हमारे संकल्पों की धारा शीतल रहती है, बुद्धि की तर्कशक्ति यथार्थ रहती है, सुख देने माशूक लेने का संस्कार सहज और व्यक्त रूप में दिखाई देता है, साथ-साथ संकटों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। तब कहा जाता है, समय साथ दे रहा है या समय पर जीत पायी है। अगर समय पाप के रूप में संग्रहित हुआ है तो भविष्य में वह प्रतिकूलता में बदल जाएगा जिसका परिणाम दुख, दर्द से भरा होगा। त्यौहारों में बैंक वाले कुछ विशेष प्रणालियां निकालते हैं ताकि जमा कर्ताओं को अधिक ब्याज मिले। वैसे ही वर्तमान समय सर्व आत्माओं के पिता परमात्मा शिव स्वयं इस धरती पर अवतरित हुए हैं और ऐसी एक विशेष प्रणाली जारी की है जो वर्तमान का एक गुना पुण्य, इक्किस जन्म के सुहावने समय में परिवर्तित हो जाये। जब हम ईश्वरीय श्रीमत् के अनुसार काम, क्रोधादि विकारों से युक्त आत्माओं को ईश्वरीय ज्ञान का दान देकर उन विकारों से छुड़ाते हैं, तो यह है सच्चा पुण्य। आत्माओं को उनके पिता परमात्मा का परिचय देना, परमात्मा की याद में रहना और दूसरों को भी उनकी याद दिलवाना, यह है सृष्टि चक्र का सबसे महा पुण्य जिससे 21 जन्मों तक समय हमें साथ देता है। जैसे एक-एक सीढ़ी चढक़र मंजिल पर पहुंचना आसान है वैसे, अब के (वर्तमान) एक-एक सेकंड को सफल करते हुए आगे बढऩा ही जीवन को सफल बनाने की विधि है। आपने घड़ी की टिक टिक आवाज को ध्यान से सुना है ? घड़ी की एक-एक टिक-टिक के साथ एक-एक स्वास हमारी आयु से कम होता जा रहा है । यह आवाज केवल पुकार ही नहीं बल्कि हमारे लिए एक सख्त चेतावनी भी है कि हे साधक जागो, यह वक्त जा रहा है, इसको सफल करो। इसीलिए हर पल भगवान की श्रीमत् अनुसार चल हर समय को पुण्य में परिवर्तित करेंगे ताकि कल्प के पूरे 5000 साल वह पुण्य, समय में बदलकर हमें साथ देता रहे

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