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परमात्मा के अलावा किसी देहधारी को कभी भी अपना जीवनसाथी या दोस्त नहीं बनाया - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
परमात्मा के अलावा किसी देहधारी को कभी भी अपना जीवनसाथी या दोस्त नहीं बनाया

परमात्मा के अलावा किसी देहधारी को कभी भी अपना जीवनसाथी या दोस्त नहीं बनाया

शख्सियत

पुरूषार्थहीन होने का कारण आलस्य है।

मशहूर फिल्म अभिनेत्री ग्रेसी सिंह की आध्यात्मिक जीवन यात्रा…
जीवन में कई बार हद से ज्यादा दौलत और शोहरत मिलने के बाद लोग अहंकार की ऊंचाई पर जाकर व्यावहारिक बातों में हर किसी को तुच्छ समझने लगते हैं। जो आए दिन विवादों में रहकर सुर्खियां बटोरते रहते हैं। ऐसे लोगों का जीवन मधुर और स्नेही ना होकर सिर्फ मतलबी होकर रह जाता है। ऐसे लोग आध्यात्मिक जीवन अपनाना तो दूर उसका मजाक बनाते हैं। लेकिन ऐसे बातों से ऊपर उठकर बॉलीवुड की एक नामचीन अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने जीवन में आध्यात्मिकता जीवन में घोलकर दिखा दिया कि सच्चा जीवन साथी परमात्मा ही है ना कि दौलत और शोहरत।
आइए जानते हैं उनका अनुभव…

शख्शियत:-
सिख परिवार में मेरा जन्म 20 जुलाई 1980 को नई दिल्ली में हुआ। पिता का नाम ‘स्वर्ण सिंह’ और मां ‘वेरजिंदर कौर’ है। मां का देहांत हो चुका है। मेरे एक भाई और एक बहन हैं। भाई का नाम ‘रूबल सिंह’ है और बहन का नाम ‘लिसा सिंह’ है। स्कूल की पढ़ाई ‘मानव स्थली स्कूल’, दिल्ली से पूरी की। अपने स्कूल के समय ही भरतनाट्यम का डांस सीखी थी। इसके बाद ‘आट्र्स’ में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। सबसे पहले टीवी सीरियल में अभिनय करना शुरू किया। फिर फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की। हमने हिंदी फिल्मों के अलावा तेलुगू, पंजाबी, मलयालम, कन्नड़, मराठी, गुजराती और बंगाली फिल्मों में भी अभिनय किया है। हमने ‘लगान वन्स अपॉन ए टाइम इन इंडिया’, ‘गंगाजल’, ‘अरमान’, ‘मुन्ना भाई एमबीबी एस.’,‘यही है जिंदगी’, ‘चंचल’, ‘ब्लू माउंटेन’ जैसी फिल्मो में काम किया है। अच्छा अभिनय की वजह से कई सारे अवाड्र्स अपने नाम की  हूं । हमारा सबसे लोकप्रिय किरदार हिंदी फिल्म ‘लगान’ का ‘गौरी’ का किरदार माना जाता है।
जब शुरू हुआ अभिनय का सिलसिला:-
हमने अभिनय की शुरुआत साल 1997 से की थी। सबसे पहले ज़ी टीवी के सीरियल ‘अमानत’ में ‘डिंकी’ और ‘अमृता’ नाम के किरदारों को निभाया था। साल 1998 में दूरदर्शन के सीरियल ‘पृथ्वी राज चौहान’ में भी मैंने अभिनय की। इस सीरियल में हमें ‘चकोरी’ नाम का किरदार अभिनय करने का मौका मिला। साल 1999 में अपना डेब्यू हिंदी फिल्मो में की। हमारी पहली फिल्म का नाम ‘हु तू तू’ है जिसके निर्देशक ‘गुलज़ार’ थे। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म का अवार्ड भी मिला था। उसी साल दूसरी हिंदी फिल्म जिसका नाम ‘हम आपके दिल में रहते हैं’ था। साल 2001 में हमने‘आशुतोष गोवारिकर’ द्वारा निर्देशित फिल्म ‘लगान वन्स अपॉन ए टाइम इन इंडिया’ में अभिनय किया। इस फिल्म में मेरे साथ अभिनेता आमिर खान और ब्रिटिश अभिनेत्री रेचेल शैली ने मुख्य किरदार को दर्शाया था। यह फिल्म ने कई सारे अवाड्र्स को अपने नाम किया था। इसके बाद एक बार फिर हमें हिंदी फिल्म ‘गंगाजल’ में ‘अनुराधा’ नाम का किरदार मिला। साल 2004 में राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मुन्ना भाई एम. बी. बी. एस’ में ‘डॉ. सुमन अस्थाना’ उफऱ् ‘चिंकी’ नाम का किरदार निभाने को मिला। फिल्म में संजय दत्त, बमन ईरानी, अरशद वारसी, जिमी शेरगिल और सुनील दत्त जैसे मुख्य किरदार के साथ काम की। साल 2005 में भी हमने ‘वजह ए रीजऩ टू कील’ में अभिनय की। साल 2006 में सबसे पहले हमको हिंदी फिल्म ‘द वाइट लैंड’ में देखा गया। साल 2007 में हमने अपना डेब्यू पंजाबी फिल्मो में किया था। साल 2008 में हिंदी फिल्म ‘देशद्रोही’ में मुझे देखा गया था। साल 2009 में हमें हिंदी फिल्म ‘विघ्नहर्ता श्री सिद्दिविनायक’ में एक अतिथि के किरदार को निभाने को मिला।
साल 2009 में ही हमने अपना डेब्यू कन्नड़ फिल्मो में भी किया था। पहली कन्नड़ फिल्म का नाम ‘मेघावे मेघावे’ था जिसके निदेशक ‘वि नगेंदर प्रसाद’ थे। फिल्म में ‘चरमल अका चंद्रमुखी’ नाम का किरदार अभिनय की। साल 2010 में मुझे तेलुगु फिल्म ‘रामा रामा कृष्ण कृष्णा’ में देखा गया।
संतोषी मां के किरदार से जीवन में आध्यात्म की ओर लगाव बढ़ा:-
सा ल 2011 में फिल्म ‘मिलते है चांस बाय चांस’ में चांस मिला। 2012 में हमें हिंदी फिल्म ‘डेंजरस इश्क़’ में देखा गया। इसके बाद उसी साल पंजाबी फिल्म ‘आपन फेर मिलंगे’ में अभिनय की जिसमें में ‘गुलाब’ नाम का किरदार था। इसके बाद हमें हिंदी फिल्म ‘कय़ामत ही कय़ामत’ में देखा गया। इस फिल्म में हमने एक गाने में अपनी उपस्थिति को दर्शाया था। साल 2013 की पहली हिंदी फिल्म ‘जनता वर्सेज जनार्दन – बेचारा आम आदमी’ में भी हमने अभिनय की। फिर साल 2013 की आखरी फिल्म ‘समाधी’ थी जो की एक बंगाली फिल्म थी। इस फिल्म में हमने‘मुक्तो’ नाम का किरदार अभिनय किया था। साल 2015 में पंजाबी फिल्म ‘चूडिय़ां’ में अभिनय किया था। इस फिल्म के निर्देशक ‘सुखवंत ढड्डा’ थे और फिल्म में हमने ‘सिमरन’ नाम का किरदार अभिनय की। साल 2015 में ही एक बार फिर हमने अपनी वापसी टीवी सीरियल में की थी। हमने टीवी के सीरियल ‘संतोषी माँ’ में ‘संतोषी माँ’ और ‘साध्वी माँ’ का किरदार अभिनय किया था। यह सीरियल लगभग 2 सालो तक टीवी पर दर्शाया गया था और फिर अक्टूबर 2017 में इसे बंद कर दिया गया था। साल 2019 में एक बार फिर हमने सीरियल ‘संतोषी माँ’ के दूसरे सीजन में अभिनय की। संतोषी मां का किरदार ने जीवन को आध्यात्मिक प्रभाव में लाया

ब्रह्माकुमारीज के ज्ञान से मुझे अंदर की खुशी मिली:-
मेरे परिवार में दूर-दूर तक एक्टिंग कलाओं से कोई संबंध नहीं था लेकिन मुझे डांस का बचपन से बहुत शौक था। शुरूआत से ही एक्टिंग करने के प्रति मेरा सोच ऐसा रहा कि मैं जो भी एक्ट करूं, वह पूरा परिवार बैठ कर देखे। मैं जो रोल करूं उससे समाज में एक सकारात्मक अच्छा मैसेज जाए। सिख परिवार से होने के वजह से मैं रोजाना सुखमणि साहब का पाठ किया करती थी। ब्रह्माकुमारीज के ज्ञान में आने का जरिया मेरी मम्मी रही। वह चाहती थी कि हम दोनों साथ में जाकर सेवन डेज मेडिटेशन कोर्स करें। एक बार मैं दिल्ली में करीब 15 दिन के लिए फ्री थी तो मम्मी ने बोली कि ब्रह्माकुमारीज आश्रम से पता करके आओ कि कोर्स कैसे और कब करने के लिए आना है? तब मैं वहां के सेवाकेन्द्र पर जाकर बिना अपना परिचय बताए पूछा कि कब से आना है और फीस क्या है? तब वहां की दीदी ने बहुत ही स्माइल करते हुए कहा कि बस समय खर्च करना पड़ेगा। उसके बाद फिर मुंबई आने के बाद में बराबर मुरली क्लास भी करने लगी। वहां की दीदी के चेहरे का ग्लो देखकर बहुत आकर्षित हुई। बाद में मुझे दादीयों का भी ह्रश्वयार बहुत मिला। शिवबाबा के इस अनोखे ज्ञान में इतना खो गई कि मेरा जो भी टेंशन तनाव छोटी मोटी कमजोरियां था वह सब गायब हो गई। मैं अंदर से फ्रेश रहने लगी। बिल्कुल संतुष्ट रहने लगी। भौतिक साधनो में हम फंसकर तो सिर्फ बाहर की खुशी जाहिर करते हैं लेकिन ब्रह्माकुमारीज के ज्ञान से मुझे अंदर की खुशी मिली।
गुरुवाणी में निराकार के बारे में बताया जरूर है लेकिन जितना क्लियर से मुझे यहां बताया समझाया गया उतना पहले कभी नहीं सुनी। अज्ञान काल में भी मुझे साकार रूप की मानें तो गुरु नानक साहब और श्री कृष्ण से बहुत ह्रश्वयार था। तो उसी स्वरूप में मैं भगवान को याद करती थी। अब तक मैं परमात्मा के अलावा किसी देहधारी को अपना जीवनसाथी या दोस्त नहीं बनाया।

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