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अहंकार बोलता है, मै ही परमात्मा हुं… - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
अहंकार बोलता है, मै ही परमात्मा हुं…

अहंकार बोलता है, मै ही परमात्मा हुं…

सच क्या है

मै ही परमात्मा हूं बोलते हुए मैने कई लोगों को देखा है। उनके हर शब्द मे अहंकार पनपता है। जब खुद आत्मा हो यह इस दुनिया मे किसी को मालूम नही तो तुम परमात्मा तक पहुंच भी नही सकतेे। परमात्मा शिव तो एकही है और वह हम सब देहधारी आत्माओं का बाप है। यह जो सृष्टिचक्र है वा जो बडा ड्रामा पांच हजार बरस का कहेंगे – चल रहा है उसमें सिर्फ और सिर्फ सौ बरस के लिए हमारे आत्मा के प्रिय परमपिता, परम आत्मा अवतरित होते है एक साधारण शरीर में। अपना परिचय देते है, आत्माओं को उनका परिचय देते है, परमात्मा का कर्तव्य क्या है, आत्मा का कर्तव्य क्या है यह बताते है, सब मानव आत्माओं को पावन बनाते है, आत्माये और सृष्टि को शक्तिशाली बनाते है उनका श्रृंगार करते है और नई सृष्टि बनाने का अपना कर्तव्य पूर्ण होने के बाद पुन: निजधामी चले जाते है।
लेकिन आत्मा-परमात्मा का ज्ञान वह आने के पहले किसी को भी मालूम नही हो सकता। क्योंकि उनके बिना वह ज्ञान कोई साधु-संत, धर्मात्मा, महात्मा, पुण्यात्मा दे नही सकते। दुसरी बात, आत्मा और सृष्टि को पावन बनाकर शक्तिशाली भी वही बना सकते है। वह हुनर सिर्फ उनके पास है। इसके बावजुद भी कई अकडबाज लोग अपने को परमात्मा कहलाने में पिछे नही हटते है।
शरीर को चलानेवाली शक्ति आत्मा है और वह आधे मच्छर के जितनी है, शरीर से अलग है, विविध शरीर धारण करके कर्म के अनुसार अपना पार्ट बजाती रहती है। एक शरीर का पार्ट खतम हुआ, फिर दुसरे में प्रवेश ऐसे करते करते इस सृष्टि रूपी रंग मंच पर पांच हजार बरस में आत्मा जादा से जादा 84 और कम से कम 1 जन्म लेती है। क्योंकि हर आत्मा को इस धरती पर पार्ट बजाना ही पडता है।
पांच हजार बरस में एक बार आकर पर-उपकारी बन परमात्मा शिव मानव आत्माये और सृष्टि परिवर्तन की निष्काम सेवा करते है। मानव आत्माओं को दिव्य शक्ति प्रदान कर इस विकारी विषय सागर का परिवर्तन क्षीरसागर में करते है। वैसे लोग स्वर्ग आसमान में समझते है लेकिन साधारण मनुष्यों को दिव्य ज्ञान देकर सृष्टि परिवर्तन में उनको मदद करते है तो यही सृष्टि स्वर्ग में बदल जाती है। इस समय सौ बरस मे सृष्टि परिवर्तन के लिए शिव परमात्मा जो मेहनत करते है वैसी मेहनत कोई भी महान आत्मा, पुण्यात्मा या साधु-संत कर नही सकते, ना ही उनको संभव है। कारण उसके लिए विकारों का, आत्मा के श्रृंगार का और विकारों का परिवर्तन श्रेष्ठ शक्ति में कैसे करना यह उनकी समझ में नही आ सकता। यह बहुत ही सुक्ष्म बाते है। उनको खुद को आत्मा है यह मालूम नही, समझो मालूम भी हुआ तो उसकी शक्ति का परिवर्तन कैसे करना यह मालूम नही। केवल विदेही परमात्मा ही उसके लिए काबिल है।
परमात्मा शिव बताते है, कि यह सृष्टिचक्र पांच हजार बरस का है और मै आने के बाद एकही बार रूहानी मिलीटरी के द्वारा बाकी सारे धर्मों का विनाश कर एक सत्धर्म की स्थापना करता हुं। इसमे विशेष बात यह है कि किसी भी प्रकार की हिंसा के बिना वह यह कार्य करते है। इसकी सत्यता जानने के लिए आप बच्चों को स्कूलों में सिखाया जानेवाला इतिहास ले सकते है। वह सिर्फ दो हजार बरस का है। उसके पहले क्या हुआ यह कोई भी बता नही सकता। कारण यह लिखाई पढ़ाई ही दो हजार बरस से शुरू हो गई है। फिर उसके लिए विज्ञान का आधार लेते है और कोई पत्थर हाथ में लेकर वह इतने अश्मयुग का है बताते है। पर सत्य ज्ञान किसको मालूम ही नही, ना ही कोई इस तरफ ध्यान दे रहा है। सिर्फ परमात्मा अवतरित होने के बाद ही यह ज्ञान मिलता है और नई सृष्टि का सृजन होने के बाद परमात्मा लुप्त हो जाता है। यह इस ज्ञान की खासियत है… -अनंत संभाजी- 6350090453

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