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आत्म अभिमानी बनने में सबसेबड़ी बाधा है हमारा भोजन - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
आत्म अभिमानी बनने में सबसेबड़ी बाधा है हमारा भोजन

आत्म अभिमानी बनने में सबसेबड़ी बाधा है हमारा भोजन

आध्यात्मिक

शिव आमंत्रण, आबू रोड/राजस्थान। विकारों से भी गहरी आदत भोजन की है। बहुत लोग इस गहरी आदत के शिकार हैं। जब देवताएं भी भोजन से मुक्त नहीं हैं और जब तक इस गहरी आदत में आघात नहीं किया जाता, तब तक चेतना में हलचल नहीं होती है और उसी हलचल की अवस्था में नए संस्कारों के बीज डाले जाएं तो कुछ नया होगा। भोजन को मौन में स्वीकार करना। प्रसन्नता के साथ कोई शिकायत नहीं, न ही उसका वर्णन करते हुए इसमें ये बहुत है, ये कम है, न ही उसके स्वाद का वर्णन। चार चीजें कम कर दो या हटा दो। पहला तेल, दूसरा शक्कर ये सब लत हैं। उत्तेजना पैदा करते हैं, तीसरा नमक जितना नमक डालोगे उतना पानी मांगेगी शरीर। जिसने नमक को हटा दिया उत्तेजना अपने आप शांत हो जाएगी। चौथा अनाज कम करते जाओ। देवताएं पहले फल खाते थे जब से अनाज खाने लगे क्योंकि अनाज के लिए चार पांच चीजें चाहिए। उसमें आग चाहिए, मसाले चाहिए, नमक चाहिए, तेल चाहिए, शक्कर चाहिए इन घातक चीजों ने शरीर में अनाज के द्वारा प्रवेश किया।द्वापर से देवताओं का पतन दो कारणों से हुआ। पहला देह भान, दूसरा आग। जिस चीज को आग में डाला गया वो खत्म। जो जितना अनाज खाते हैं उनको चार चीजें होती हैं। दोपहर में नींद, आलस्य, प्रमाद, जड़ता शरीर में। अगर तीन बार खाते हैं तो दो बार कर दो। दो बार खाते हैं तो एक बार कर दो। अपने आप शरीर में नई ऊर्जा जागेगी और बिना स्वास्थ्य के आध्यात्म फेल है। जिसका शरीर ही साथ नहीं दे रहा, वो कहां से आध्यात्म का अभ्यास करेगा, कहां से अशरीरीपन, कहां से उमंग-उत्साह आएगा। सारा ध्यान बीमारी की तरफ जाएगा।
आध्यात्म की शर्त है स्वस्थ्य शरीर। न केवल स्वस्थ्य, उसमें तीन चीजें हैं। पहला लचीला, दूसरा स्टैमिना, तीसरा सक्रिय शरीर। फल-सब्जी जितना हो सके कच्चा या तो फिर उबाला हुआ या तो फिर भाप वाला। जितना उसको पकाया जाता उतना उसके पोषक तत्व नष्ट होते हैं और जो स्वाद है वह केवल मसालों का स्वाद है और कुछ भी नहीं। असली स्वाद तो पता ही नहीं किसी को और जब शरीर उच्च कंपन भोजन से भरा होता है जो हम खा रहे हैं वो राजसिक है उत्तेजना वाला है। हम इसके हाथ का नहीं खाते, हम उसके हाथ का नहीं खाते, प्याज-लहसुन नहीं खाते, बीमारी तो उतनी ही है जितना ये सब खाने वाले को है। आत्म अभिमानी बनने में सबसे बड़ी बाधा है भोजन। जब तक इस पर काम नहीं किया जाए आत्मा चिपकी रहेगी शरीर से नीचे। इसको उड़ाना है ऊपर, हल्कापन आ जाए शरीर में। भागने को कहो तो कितना भी भागे, कसरत करने को कहो तो कितना भी कसरत करे, कितनी भी सीढ़ियां चढ़े, ऐसी शक्ति, ऐसी ताकत तभी आएगी जब भोजन हल्का हो। अव्यक्त और साकार महावाक्य हैं – बाबा के योगी का भोजन सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होते जाएगा, ख़ुशी जैसी खुराक नहीं। ख़ुशी ही उसकी ख़ुराक है। योग में बैठ गए तो ऐसे बैठ गए की खो गए उसे याद ही नहीं। सबसे बुरी आदत है भोजन। ये खाऊं वो खाऊं, क्या खाऊं और कब खाऊं। अभी-अभी नाश्ता किया, अभी-अभी टोली खाई। दोपहर में क्या बनाना हैं। दिन-रात बुद्धि घूम रही है उधर था विषय वैतरणी नदी से निकले तो तेल वैतरणी नदी में डूबे हुए हैं। रोटी है उसको तेल लगाओ, चावल है सफ़ेद उसका कलर चेंज करो, दाल बनी हुई है उसको वापस डालो। सूरज ने इतनी मेहनत से पकाया है। पका- पका के अम्लीय भोजन बन जाता हैं।

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