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फौज में रहते हुए भी मेडिटेशन रहा जीवन का हिस्सा, आध्यात्मिक जीवनशैली अपनाई - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
फौज में रहते हुए भी मेडिटेशन रहा जीवन का हिस्सा, आध्यात्मिक जीवनशैली अपनाई

फौज में रहते हुए भी मेडिटेशन रहा जीवन का हिस्सा, आध्यात्मिक जीवनशैली अपनाई

शख्सियत

जीवन में सदा खुशी लाने की कला किसी भी क्षेत्र में रह कर हम सीख सकते हैं। अपना जीवन सरल बना सकते हैं। यह हमारे जीवन में आध्यात्म और मेडिटेशन से संभव है, फिर चाहे हम किसी भी पद-पोजीशन पर क्यों न हों। खासकर लोग फौज में बदले के भाव में सोचते हैं कि मरना-मारना ही जीवन है लेकिन नहीं, देश की रक्षा हमारे स्वयं की रक्षा में निहित है जो कि जीवन में आध्यात्म अपनाने से होगा। जिसका एक विशेष मिशाल मेजर कर्नल बीसी सती हैं जो फौजी ऑफीसर होकर भी जीवन को उदाहरण मूर्त बनाया है। आइए जानते हैं उनका खास अनुभव…


शिव आमंत्रण,आबू रोड। 32 साल की अवधि मेरी फौज में पूरी हो चुकी है। 1998 में मेरा फौज में आना हुआ। मेरे बाल आज भी काले हैं। जैसा कि पहले दिन था यह भी खुशी का राज है। कई लोग पूछते हैं सर आप कौन सा बाल में डाई लगाते हैं तो मैं कहता हूं मैं खुशी का डाई लगाता हूं। कई लोग सोचते हैं क्या आध्यात्मिक जीवन फौज में रहकर संभव है, क्या एक फौजी सात्विक जीवन जी सकता है? यह सवाल मेरे जीवन में खुशी का एक स्रोत बन कर उभरा है जो निरंतर मुझे खुश रखता है। लखनऊ के लिए कहता हूं लक नाउ मैंने लखनऊ के राजयोग सेवाकेंद्र पर जाकर सात दिन का राजयोग मेडिटेशन कोर्स किया। हमेशा लखनऊ के लिए कहता हूं लक नाउ जो मेरा सौभाग्य है। मुझे जब राजयोग चित्र प्रदर्शनी समझाया जा रहा था, तब मुझे लगा कि इस ज्ञान में एक गहरा रहस्य मीनिंग है। तब मुझे क्लीयर फिलिंग आई कि जैसे यही सत्य परमात्मा का आत्म उन्नति के लिए ज्ञान है। अगर हम इस ज्ञान को फॉलो करेंगे तो जीवन में यह ज्ञान हमारे वैल्यूज को बढ़ाएगा, शक्ति को बढ़ाएगा। उस दिन मैंने निर्णय लिया कि अब से मैं सेवाकेंद्र में उस ब्रांच में नियमित जाऊंगा। उसके तीन महीने बाद मुझे संकल्प आया कि मेरे हॉस्टल के भोजन में थोड़ी अशुद्धता हैं प्योरिटी नहीं है इसलिए अब मैं वही भोजन करूंगा जो हम माउंट आबू में पवित्र प्रसाद के रूप में खाते हैं जो बिल्कुल ईश्वर की याद में बनता है। जहां भोजन बनने के बाद परमात्मा को भोग लगाया जाता है। इसके बाद ही लोग स्वीकार करते हैं। ब्रह्माकुमारीका में सबसे बड़ी बात सिखाई जाती है वह है मेडिटेशन। पढ़ाई में मैं कुछ खास नहीं था। हमेशा थर्ड-सेकंड डिवीजन ही आते थे, लेकिन मेडिटेशन अभ्यास के बाद मेरे एकाग्रता का लेवल बढ़ता गया और मैंने बीएससी फस्र्ट डिवीजन 75′ सिक्योर किया। इसके बाद मुझे संकल्प आया कि अब मैं अपनी जिंदगी परमात्म समर्पण भाव से जीऊंगा। ब्रह्माकुमारीज़ हेडक्वार्टर में आकर अपना जीवन देना ऐसा मेरे मन में एक विचार था। लेकिन घर की परिस्थिति मेरी कुछ अलग थी। जब मैं कक्षा 9 में था तब मेरे पिताजी भारतीय नौसेना में थे। वे बीमारी से गुजर गए। हम दो भाई और तीन बहनें थे तो माताजी का हमारे ऊपर एक प्रेशर था कि आपको पढऩा भी है और तीनों बहनों की शादी भी करनी है। हमारे बड़े भाई बहुत सिंपल हैं बिजनेस करते हैं।

आज तक हमने किसी को गाली नहीं दिया
मैं जब आर्मी में आया तो शॉर्ट सर्विस ऑफिसर था। आज तक हमने किसी को गाली तक नहीं दिया। जब मैं कोई पार्टी में जाता था तब मुझे स्वागत में शराब दी जाती थी लेकिन मैं नींबू पानी पीता था। मैंने जब फौज में पांच साल पूरे किए उसके बाद पांच साल एक्सटेंशन के लिए फॉर्म भरा। लेकिन मेरे सीईओ ने आदेश दिया तुम्हें और सर्विस करनी है। उन्होंने कहा कि मेजर सती आप हमारे लिए एक एसेट्स हो, जानते हो जब कोई पार्टी होती है तो सिर्फ मुझे आप पर भरोसा होता है क्योंकि आप नींबू पानी पी रहे होते हो और लोग शराब पी रहे होते हैं। ऐसी सिचुएशन में कोई बात हो जाए तो आप ही संभाल सकते हो।

लोग जीवन जीने की शैली से प्रभावित होते
उन दिनों मैं हैदराबाद में पोस्टेड था। वहां के ब्रह्माकुमारीज़ सेवाकेंद्र में इंचार्ज बहन से मैंने पूछा कि मैं इंडियन आर्मी में हूं। पांच साल शॉर्ट सर्विस ऑफीसर रहा लेकिन मैं अब जॉब छोडऩा चाह रहा हूं लेकिन हमारे बॉस ने कहा है कि आपको यह जॉब करना ही है, मैं क्या करूं? तो उन्होंने कहा, नहीं यह जॉब नहीं छोडऩी आपको, करते रहना है। परमात्मा आपसे विशेष सेवा लेने वाला है तो उन्होंने भी मोहर लगा दिया। मेरा एक नियम रहा कि मैंने आज तक फौज में किसी को ब्रह्माकुमारीज का ज्ञान मुख से नहीं सुनाया। वह लोग हमारे कर्मों से हमारी जीवन जीने की शैली से प्रभावित होते थे। फौज में अगर कोई आध्यात्मिक व्यक्ति हो तो उसके चरित्र से उसे हर कोई पकड़ लेता है क्योंकि उनका जीवन जीने का स्टाइल अलग होता है। जैसे-शराब की जगह नींबू पानी पीएंगे, सुबह चार बजे उठ जाएंगे।

हर कोई आतंकवादी नहीं होता
1995 में जम्मू कश्मीर में बहुत आतंकवाद था। उस समय हमारी पलटन कंपनी को लाल चौक जैसी कठिन जगह के पास पोस्टिंग मिली। मैं सबसे जूनियर मेजर था फिर भी हमारे बॉस ने हम पर काफी भरोसा जताया, क्योंकि वह हमसे आध्यात्मिकता की वजह से काफी प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने मुझे डिफीकल्ट स्थान दिया। शुरू में तो मैंने सोचा कि कोई भी आतंकवादी मुझे दिखेगा तो मैं सीधे उसको सूट कर दूंगा लेकिन मुझे एक महीना उस इलाके को समझने में लगा। मैंने वहां देखा मिलिटेंसी से जुड़े हुए बहुत कम लोग हैं। बहुत लोग यहां ऐसे हैं जो हमारे जैसे लोग हैं जो छोटा-मोटा धंधा कर रहे हैं। गुजर-बसर कर रहे हैं, बिजनेसमैन हैं। तब मुझे दिमाग से हट गया कि हर कोई व्यक्ति, मुसलमान या दाढ़ीवाला आतंकवादी ही होता है

परमात्मा को मित्र बना कर रखा
मेरी एक आदत थी कि मैं पैदल ही पेट्रोलिंग के लिए निकल पड़ता था। लाल चौक तक भी मैं कई बार पैदल जा चुका था, लेकिन कुछ बात का ध्यान रखता था कि जब भी हमारी टीम निकलती थी तो 12-14 लोग हम साथ होते थे और हमारा हथियार हमेशा चलने के लिए तैयार रहती थी और हम अपनी नजरें ऐसे घूमाते थे कि दुश्मन हमारी नजरों से बच ना सके और वह भी अटैक ना कर सके। मैंने कई आतंकवादियों को पकड़ा जिससे काफी हथियार, गोला-बारूद बरामद हुए और कइयों को सच्चा व्यक्ति पहचान कर कि यह किस मजबूरी के हालात में आतंकी बना, यह जानकर-समझकर छोड़ भी दिया। फिर उसके जीवन में गजब का बदलाव आता था। हमेें जिस भी बार्डर पर ड्यूटी मिली वहां पाकिस्तानी फौजी के साथ शांति और दोस्ताना व्यवहार बनाने में कामयाब रहा। कारगिल बार्डर इसका विशेष उदाहरण है। मैं जहां भी पोस्टेड रहा, वहां स्वास्थ्य और खुशी का राज अपनी दिनचर्या में ध्यान और मेडिटेशन के अभ्यास को शामिल करना रहा। साथ में हमारा दूरदर्शी, पॉजिटिव, ट्रस्टीपन और खुशनुमा विचार का कमाल रहा। मैं हर एक काम में परमात्मा को मित्र बनाकर रखता हूं।

1983 में लखनऊ में बीएससी फाइनल ईयर की पढ़ाई के दौरान मैं राजयोग मेडिटेशन से जुड़ा हुआ नहीं था। तब तक मैं हनुमान जी का भक्त रूप में पांच बार चालीसा पढ़ कर आराधना करता था। एक दिन मुझे एक दुकान पर परमात्मा शिव बाबा का निराकार चित्र देखने को मिला। मैंने जब उस चित्र को थोड़ी देर देखा तो उस दुकानदार से पूछा कि ऐसा चित्र मैंने आज तक नहीं देखा, यह किसका परिचय है तो उस दुकानदार ने मुझे बताया कि यह परमपिता परमात्मा का परिचय है जो सभी आत्माओं के पिता हैं तो मैंने कहा इसकी स्पष्ट जानकारी और परिचय कहां से मिलती है? तो उन्होंने कहा कि एक ईश्वरीय विश्व विद्यालय है जिसे लोग ब्रह्माकुमारीज़ के नाम से जानते हैं। वहां पर परमात्मा का सत्य परिचय दिया जाता है।

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