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भगवान की याद में पकाये, स्वीकार कराए भोजन को कहा जाता है प्रसाद

भगवान की याद में पकाये, स्वीकार कराए भोजन को कहा जाता है प्रसाद

दिल्ली राज्य समाचार

लोधी रोड सेवाकेंद्र द्वारा आयोजित ई संगोष्ठी में व्यक्त विचार

शिव आमंत्रण, नवी दिल्ली। दिल्ली के लोधी रोड सेवाकेंद्र द्वारा आयोजित ई संगोष्ठी कार्यक्रम का विषय रहा यथा अन्न तथा मन। इस अवसर पर मन पर अन्न के प्रभाव को समझाने के लिए उपस्थित वक्ताओं ने इस विषय पर अपने विचार रखे और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जिस मनोदशा से भोजन पकाया, परोसा और ग्रहण किया जाता है उसी के अनुरूप हमारे आचार-विचार और संस्कार बनते जाते हैं, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनता जाता है। इस दौरान भारत अक्षय उर्जा विकास संस्था समिति में तकनीकी सेवाओं के निदेशक चिंतन शाह, ओडि़शा राउरकेला से एनएचपीसीएल के एडीजी अरूण साहू, स्थानीय सेवाकेंद्र प्रभारी बीके गिरीजा, प्रेरक वक्ता बीके पीयूष मुख्य वक्ता रहे।
मौके पर चिंतन शाह ने कहा, जो चीज हमारे काम की नही है उसका त्याग करना, यही सतत विकास की प्रक्रिया का मूलभूत सिध्दांत है। नवीनीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत विश्व में चीन के बाद दो नंबर मे आता है। हमारे पास जीवाश्म इंधन का बडा भंडार नही है और हम प्राकृतिक गैस और पेट्रोल आदि आयात करते है। इसलिए नवीकरणीय उर्जा का दोहन करना हमारी बाध्यता भी है। नवीकरणीय ऊर्जा में सौर ऊर्जा के अलावा पवन ऊर्जा और हाइड्रोलिक हाइड्रो ऊर्जा व्यावहारिक विकल्प है। इसके अलावा कूडे से ऊर्जा बनाने के विकल्प भी मौजूद है।
बीके अरूण साहू ने कहा, मन में उत्पन्न होनेवाले स्पंदन भोजन को प्रभावित करते है। यदि भोजन बनाते समय विटामिन, कार्बोहाइड्रेट आदि का ध्यान रखे और वाइब्रेशन की अवहेलना करते रहे तो वह भोजन संतुलित भोजन नही कहलाएगा। उन्होने बूचडखाने का उदाहरण देकर समझाया कि मांस के लिए काटे जानेवाले पशु में आतंक, भय, हिंसा और बेबसी के वायब्रेशन होते है जिनका खानेवाले के मन पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।
बीके गिरीजा ने कहा, शुध्द भोजन का मतलब यह नही की हम हरदिन अच्छा गरिष्ठ भोजन बनाकर खाये। घर में जो भी अन्न उपलब्ध है उसे भगवान की याद में पकाये, भगवान को भोग स्वीकार कराए इसके बाद भगवान की याद में इसे स्वीकार करें तो यह भोजन प्रसाद बन जाएगा।
बीके पीयूष ने कहा, आज विज्ञान भी मानता है कि हमारा शरीर शाकाहारी भोजन के अनुकूल बना है। जब किसी घर में मृत्यु हो जाती है तो उस दिन वहां भोजन नही बनता क्योंकि वहां दु:ख के वायब्रेशन होते है। इससे सिध्द होता है कि भोजन के साथ वाइब्रेशन का कनेक्शन है। आंखों से देखना, कानों से सुनना, मुंह से बोलना और मन से विचार करना ये भी भोजन का सूक्ष्म स्वरूप है।

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