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सन्तुष्टता के बिना जीवन में खालीपन….. - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
सन्तुष्टता के बिना जीवन में खालीपन…..

सन्तुष्टता के बिना जीवन में खालीपन…..

छत्तीसगढ़ राज्य समाचार

रायपुर, 03 सितम्बर: वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका ब्रह्माकुमारी किरण दीदी ने कहा कि सन्तुष्टता ऐसा विशेष गुण है जिसके अभाव में मनुष्य अपने जीवन में खालीपन महसूस करता है। जिस प्रकार विनम्रता न हो तो विद्या व्यर्थ है। अगर उपयोग न किया जाए तो धन व्यर्थ है। उसी प्रकार सन्तुष्टता के बिना जीवन निरर्थक हो जाता है। इस एक गुण के कारण मनुष्य चिन्ता, तनाव, भय और निराशा आदि सभी नकारात्मक बातों से बच जाता है। वह सुख का अनुभव करता है।
ब्रह्माकुमारी किरण दीदी आज प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के रायपुर सेवाकेन्द्र द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिदिन प्रसारित होने वाले आनलाईन वेबसीरिज एक नई सोच की ओर में अपने विचार व्यक्त कर रही थीं। विषय था- सन्तुष्टता।
उन्होंने आगे कहा कि यदि सन्तुष्टता का अनुभव करना चाहते हैं तो शिकायत करना छोड़ दें और वर्तमान जीवन का आनन्द लेना सीखें। यदि किसी के जीवन में मानवीय गुण तथा नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य धारण किए हुए हैं तो वह व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से सम्पन्न कहलाएगा। यहाँ सम्पन्नता का आशय धन और सम्पत्ति से नहीं है। सन्तुष्टता के अभाव में हरेक व्यक्ति असन्तुष्ट है। असन्तुष्टता का कारण है आध्यात्मिक शक्तियों की कमी। इन्हीं आन्तरिक शक्तियों के न होने से रिश्तों में दरार आ रही है। परिवार बिखर रहे हैं। लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ रही है। मनोरोग और अन्य बिमारियाँ बढ़ती जा रही है।
उन्होंने बतलाया कि सन्तोष रूपी गुण न होने से लोगों के अन्दर किसी की दी हुई शिक्षा और सावधानी को सुनने की ताकत नहीं है। अनेक लोग इन शिक्षाओं को सुनकर बुरा मान जाते हैं और आपघात तक कर बैठते हैं। सन्तुष्ट रहना है तो जो व्यक्ति जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करने की आदत डालनी होगी। मत भूलिए कि यह दुनिया एक रंगमंच है जिसमें हरेक अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। इसलिए किसी के कार्य को देखकर नाराज न हों।
ब्रह्माकुमारी किरण दीदी ने कहा कि गुणों से सम्पन्न बनने के लिए हमें अपने अन्तर्गत जगत में झाँकना होगा। हमारा अन्र्तजगत अनेक गुणों से भरा हुआ है। अपने अन्दर देखने, समझने और अनुभव करने की जरूरत है। स्वयं को जानना होगा कि मैं कौन हूँ? आज हम अपनी पहचान को भूल गए हैं। अपने शरीर को ही सब कुछ मानकर बैठे हैं। आत्मा और परमात्मा का परिचय ही नहीं है। राजयोग के द्वारा परमात्मा से सम्बन्ध जोडक़र उनसे शक्तियाँ प्राप्त कर सकते हैं। अन्त में उन्होंने राजयोग मेडिटेशन का व्यवहारिक अभ्यास भी कराया।

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