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सहयोग देना ही सहयोग लेना है, सदा सहयोगी बने - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
सहयोग देना ही सहयोग लेना है, सदा सहयोगी बने

सहयोग देना ही सहयोग लेना है, सदा सहयोगी बने

जीवन-प्रबंधन

शिव आमंत्रण, आबू रोड/राजस्थान। कोई व्यक्ति कभी-कभी सोचता है कि वह सबकुछ कर सकता है लेकिन फिर भी वह एक परिवार में रहता है, समाज में रहता है तो उसे समय प्रति समय दूसरों के सहयोग की आवश्यकता रहती है। जितना उसके व्यवहार में मधुरता, स्नेह, दूसरों के प्रति सम्मान एवं सहयोग की भावना होती है उतना वह सबका दिल जीत लेता है और वक्त एक जैसा नहीं रहता, आज अच्छा है तो कल बुरा वक्त भी आ सकता है। ऐसे समय में उसे सहयोग मांगने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि हर कोई उसके पास मदद करने के लिए हाजिर हो जाता है। कहा जाता है सहयोग कि मांगने से नहीं मिलता लेकिन सहयोग देने से सहयोग मिलता है। हम किसी को सहयोग देते हैं तो हमें भी जब सहयोग की आवश्यकता होती है तो वह देते हैं और इसके लिए मन में नफरत और द्वेष भावना को पनपने न दें। नफरत और द्वेष की भावना हमें एक-दूसरे से दूर ले जाती है और सम्बंधों में ऐसी गांठ बना देती है जो कभी हमें एक-दूसरे के समीप भी आने नहीं देती। उन गांठों को खोलने का सहज तरीका है सहयोग की भावना को विकसित करें, उसके बाद हम सहयोग के चमत्कार को जीवन में अनुभव कर पाएंगे। विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति को विकसित करने के लिए जीवन में न्यारापन एवं अन्तर्मुखता के गुणों को धारण करने से हम लोभ वृत्ति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। भारत में देवी-देवताओं को किसी-न-किसी वाहन पर विराजमान दिखाते हैं। इसका कारण यह है कि सभी पशु-पक्षियों में कोई-न-कोई विशेषता है जिसे हमें भी अपने जीवन में धारण करने की आवश्यकता है। ऐसी ही भोलेनाथ के मंदिर में दरवाजे पर कछुआ रखा होता है। कछुए की विशेषता यह है कि वह अपने अंगों को विस्तार में भी ला सकता है और संकीर्ण भी कर लेता है। जब उसे कर्म करना है तब वह अपनी इंद्रियों को विस्तार में लाता
है और जब वह कोई खतरा देखता है तो अपनी इंद्रियों को संकीर्ण कर लेता है। वास्तव में इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी अपनी कर्मेन्द्रियों को जब कर्म करना है तो विस्तार में आना है और जब कर्म पूरा हो तो अपनी कर्मेन्द्रियों को समेट लेना है और अंतर्मुखी स्थिति में स्थिति होना है या जहां कोई खतरे का आभास हो तो वहां से न्यारे हो जाना ही समझदारी है।
आज संसार में मनुष्यों के सामने अनेक समस्याएं प्रकट होती रहती हैं। व्यक्ति के जीवन में कोई एक दिन ऐसा नहीं होगा जिस दिन के लिए वह कहे कि आज कोई समस्या नहीं आई और उसमें से कई समस्याएं उसकी खुद की निर्मित की हुई होती हैं। वह भी खासकर जब वह अधिक वाचाल हो जाता और न बोलने वाली बातें बोल देता, फिर जब वही बातें उसके सामने किसी-न-किसी प्रकार की समस्या को ले आती हैं तब कई बार व्यक्ति पछताता है कि इससे तो नहीं बोलते थे तो ज्यादा अच्छा होता परन्तु क्या करें? तभी तो कहा जाता है कि अंतर्मुखी सदा सुखी और बाह्ममुखी सदा दुखी। कभी-कभी व्यक्ति को यह महसूस ही नहीं होता कि उसकी बोली हुई बातें बढ़ते- बढ़ते कैसे बात का बतंगड़ बन जाती हैं।

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