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राजयोग के अभ्यास से मिट गए विधवा और अबला होने जैसा अभिशाप - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
राजयोग के अभ्यास से मिट गए विधवा और अबला होने जैसा अभिशाप

राजयोग के अभ्यास से मिट गए विधवा और अबला होने जैसा अभिशाप

शख्सियत

“हम तेरे बिन अब रह नहीं सकते, तेरे बिना क्या वजूद मेरा। तुझसे जुदा अगर हो जाएंगे तो खुद से ही हो जाएंगे जुदा, क्योंकि तुम हो बाबा मेरी जिंदगी”
३८ वर्षीय शबनम सोनी आज कुशलतापूर्वक पूरी परिवार को चला रही हैं। जो पति की मृत्यु के बाद टूट चुकी थीं फिर भी साहस और आत्मबल की बदौलत अपने बच्चों और परिवार को खुशियों से भरी जिंदगी संतुलित करने में कामयाब रही हैं। वह इस कामयाबी का श्रेय राजयोग के निरंतर अभ्यास को देती हैं।

शिव आमंत्रण आबू रोड। हमारे समाज में नारी का सफर चुनौती भरा जरूर है, परंतु उसमें चुनौतियों से लडऩे का साहस आ गया है। आज की नारी आर्थिक व मानसिक रूप से आत्मनिर्भर है। परिवार व अपने कॅरियर दोनों में तालमेल बैठाती नारी का हिम्मत वाकई काबिले तारीफ है। आज तक विधवा और अबला कहलाने वाली नारी भी हिम्मत और आत्मबल से समाज की पुरानी रूढ़ीवादी परंपरा को तोड़ते हुए खुशनुमा जिंदगी जीने की राह पर दिखाई दे रही है। इसी बात की गवाह बिहार के बेगुसराय जिले के खंहार गांव में जन्मी शबनम सोनी हैं जो अपने पति के आकस्मिक मौत से आहत होकर खुद को कमजोर, अबला और विधवा मानकर कुं ठित जिंदगी जी रही थीं लेकिन राजयोग के अभ्यास ने उन्हें समाज की प्रेरणादायी सशक्त नारी बना दिया है। ब्रह्माकुमारीज़ के शांतिवन परिसर में पधारने पर शिव आमंत्रण पत्रिका के साथ खास बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के पे्ररणादायी अनुभव सांझा किए। उन्हीं के शब्दों में उनकी कहानी…

भगवान की खोज में उठते प्रश्न
मेरा जन्म वर्ष 1980 में एक शिक्षित और समृद्ध परिवार में हुआ । मेरी मां शिव भोलेनाथ की बहुत बड़ी भक्त थीं। मैं बचपन से गंभीर स्वभाव की होने के कारण मां के भक्ति भाव से बहुत प्रेरित थी। इससे भगवान के बारे में सोचते रहना एक स्वभाव में आ चुका था। जैसे- क्या कोई इस संसार को चलाने वाला है? इंसान को कौन बनाता है? न जाने यह सृष्टि कितनी बड़ी और कब तक चलती है? भगवान कौन है और कैसा हो सकता है? ऐसे कई सवालों के जबाब न मिल पाना मेरे लिए एक चिंता का विषय जैसा था।

राष्ट्रप्रेम के वजह से झूम-झूम कर गाना
मैं मां को देखकर शिवभक्ति तो करती ही थी परंतु ज्ञान की देवी सरस्वतीजी की पूजा-वंदना करना बहुत अच्छा लगता था। क्योंकि बचपन से मुझे संगीत के साथ-देशभक्ति में बहुत रुचि थी। हमेशा स्कूल-कॉलेज के दिनों में देशभक्ति गीत राष्ट्रप्रेम से अभिभूत होकर झूम-झूम कर गाती रहती थी। हमेशा प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त किया। अपने देश का बचपन से बखान सुन-सुन कर मेरे अंदर देशप्रेम भी भावना इस कदर उमर चुकी थी कि मुझे लगता था काश मैं भी देश की आजादी में शामिल हुई होती तो आज मेरा सौभाग्य कुछ और ही होता।

जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत
मेरे सुमधुर गीतों की आवाज के कायल होने के कारण एक-दो लडक़े ने मुझसे प्रेम विवाह के लिए प्रस्ताव रखा। इस बीच मेरी शादी एक किसान परिवार में हो गई। शुरुआती दस साल पति के समय तो खट्टे-मीठे अनुभव भरे रहे। जिंदगी खुशनुमा गुजर रही थी। ऐसे में एक घटना ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी।

जीवन का वो दु:खद हादसा…
मेरी शादी के दस साल बीतने के बाद मैं अपने दो बेटों के साथ घर पर थी उसी समय मेरे पति और उनके छोटे भाई करंट की करंट लगने से मौत हो गई। घर के दोनों चिराग एक साथ बुझ जाना यह मेरे और मेरे बेटों सहित पूरे परिवार के लिए पहाड़ टूटने जैसा ही था। मेरे रो-रोकर आंसू सूख चुके थे। मैं जिंदगी जीने की आश छोड़ चुकी थी। मैं इतना टूट चुकी थी कि भगवान पर से पूरी तरह आस्था उठ गई थी। खुद को संसार में असहाय मानने लगी थी। घर में दो बेटों मेरे और दो बेटों देवरानी के यानी चार बेटों की पढ़ाई सहित बुजुर्ग मां- बाप की देखभाल कर जीवन चलाना मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती भरा था। उस चुनौती के दबाब में मैं आत्महत्या करने जा रही थी।

एक अदृश्य ताकत और बेटों की ममता ने मुझे अंदर से थाम कर रखा
घर में बड़ी बहू होने के नाते मेरे ऊपर सबका पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी थी। परिस्थितियों से घबराकर मैंने आत्महत्या तक का मन बना लिया था, तब मेरे अंदर मानो एक अदृश्य शक्ति ने जीने के लिए प्रेरणा दी कि तुम्हें जिंदा रहकर इन लोगों की देखभाल करनी हैङ। तब मैंने भी सोचा कि अपने बेटों की ममतावश मुझे जिंदा रहना ही होगा। तब मैं एक बार फिर हिम्मत के साथ जिंदगी की जंग जीतने के लिए तैयार हो गई। क्योंकि मेरे आलावा मेरे परिवार को देखने वाला कोई नहीं था। मैंने हिम्मत के साथ पैथोलॉजी की पढ़ाई पूरी कर प्राइवेट पैथोलॉजी संस्थान ’वॉइन किया। साथ ही अपने बेटों सहित पूरे परिवार का भरण-पोषण करने लगी। फिर भी जीवन में एक प्रकार की हताशा और निराशा बनी रहती थी।

भगवान का मेरे जीवन में पति और प्रेमी के रूप में आगमन
एक समय ऐसा आया जब ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान से जुड़ी एक बहन ने मुझे एक बार संस्थान की पत्रिका भेंट कर राजयोग मेडिटेशन सीखने की बात कही। उस पत्रिका के एक प्रेरणादायी लेख पढक़र मैं बेहद प्रभावित हुई। उसके बाद ब्रह्माकुमारीका के राजयोग मेडिटेशन सेवाकेंद्र पर सात दिन का कोर्स करने के लिए प्रेरित हो गई। पहली बार मेडिटेशन केंद्र के सुमधुर सुंदर वातावरण में पहुंच कर गहरी शांति का अनुभव किया, जहां पहुंच कर मेरा रोम-रोम खिल उठा। मुझे एहसास हुआ कि मैं कोई अलग दुनिया में आ चुकी हूं। वहां के भाई-बहनों के स्नेह-प्रेम ने ऐसा एहसास कराया जैसे लगा इन लोगों से मैं कई जन्मों से बिछुड़ी हुई थी जो मुझे यहां आकर सब मिले हैं। सात दिन का राजयोग कोर्स पूरा करने के बाद मुझे अनुभूति हुई कि भगवान मिल गए, मैं फूली नहीं समाती थी। खुशी से परमात्मा की याद में मेरे आंसू बहने लगे। क्योंकि परमात्मा का मेरे जीवन में पति और प्रेमी के रूप में आगमन हुआ। जो पाना था सो पा लिया। राजयोग के निरंतर अभ्यास से हमारा मनोबल काफी बढ़ गया

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