सभी आध्यात्मिक जगत की सबसे बेहतरीन ख़बरें
ब्रेकिंग
सही शिक्षा, सही सोच और सही ज्ञान ही हमें ताकत दे सकता है कला के जादू से जीवंत हो उठी रचनाएं, सम्मान से बढ़ाया कलाकारों का मान कलाकार कैनवास पर उकेर रहे मन के भाव कारगिल युद्ध में परमात्मा की याद से विजय पाई: ब्रिगेडियर हरवीर सिंह भारत और नेपाल में भाईचारा का नाता है: नेपाल महापौर विष्णु विशाल राजनेताओं का जीवन आध्यात्मिक होगा तो भारत समृद्ध बनेगा सेना जितनी सशक्त रहेगी हम उतनी शांति से रहेंगे: नौसेना उपप्रमुख घोरमडे
अब रिटर्न जरनी है… - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
अब रिटर्न जरनी है…

अब रिटर्न जरनी है…

आध्यात्मिक

मेरा हाथ, मेरे कान, मेरी नाक, मेरी उंगलियां ऐसा मेरा-मेरा हम पूरा जन्म कहते रहते हैं लेकिन मैं कहने वाला कौन है इसके बारे में हमने कभी सोचा है? वह मैं आत्मा है और शरीर को चलाने वाली सितारे जैसी शक्ति है। पांच ज्ञानेंद्रियों द्वारा जो संदेश उसे मिलते हैं और वह जिन संस्कारों से प्रभावित है उसके अनुसार वह निर्णय लेकर कार्य करता है। उसका मूल घर है ब्रह्माण्ड या परमधाम। शरीर लेकर आत्मा जहां चल रही है उसे कर्मक्षेत्र कहा जाता है। यहां आकर हम ज्यादा से ज्यादा 84 या कम से कम एक जन्म इस धरती पर लेते हैं और कर्म करते रहते हैं…
आत्मा का स्वरूप सितारे जैसा है लेकिन सूक्ष्म है, स्थूल आंखों से उसे देखा नहीं जा सकता। आत्मा के पिता का नाम शिव है। वह सब आत्माओं के परमपिता है। स्थूल शरीर के पिताजी हर जन्म में अलग अलग होंगे लेकिन कोई किसी भी धर्म के हो, सब के पिताजी शिवजी है। सांप्रत काल में वह सब आत्माओं को अपना सत्य परिचय देकर भाग्य बांटने आये हैं। आगमन के बाद वह ब्राह्मण कुल और देवता व क्षत्रिय धर्म की स्थापना करते हैं और इनका काल दो हजार पांच सौ बरस का है। अभी फिर जहां से हम अशरीरी आये थे उस परमधाम में उसी अवस्था में जाने का समय आ गया है। वह आत्मिक दुनिया सुनहरे रंग की परमपावन लुभावनी दुनिया है। इस दुनिया के सब झमेलों को दूर रखकर देह को भी भूलकर वहां परमपिता को याद करेंगे तो उसके सुख-शांति-प्रेम-आनंद-पवित्रता आदि शक्तियों का अनुभव होगा और वह जितना चाहो उतना बढ़ा सकते हैं। उसे याद करके प्राप्ति करने की विधी वही बताते हैं और इसे प्राचीन राजयोग कहा जाता है। यह योग केवल और केवल शिव पिता ही सिखाते हैं कोई व्यक्ति या धर्मपिता, महात्मा सिखा नहीं सकते हैं। इस योग के लिए कोई विशेष आसन की भी जरूरत नहीं है, चलते-फिरते, कहीं भी आते-जाते, भोजन करते उसको याद करके जीवन मौज में जी सकते हैं, जिस भगवान को ढूंढ रहे थे वह इतनी आसानी से मिल गया तो और क्या चाहिए? पाना था सो पा लिया और क्या चाहिए ऐसा अनहद नाद मन से निकलता रहता है। चाहो तो सदा आनंद में रहो, सुख में रहो, पवित्रता का पान करते रहो, असीम – अलौकिक शांति की अनुभूति करते रहो… जन्मों-जन्मों के मन की प्यास बुझा दो… क्योंकि परमपिता शिव पांच हजार बरस में एक ही बार इस धरा पर ब्रह्मा तन के आधार से अवतरित होते हैं और पांच हजार बरस का अविनाशी कार्य इस अल्पकाल में पूरा करके अपने निजधाम जाते हैं……….तो फिर देर किस बात की, कदम बढाते चलो, सब गोप-गोपियां खुशियों के झूले में झूलते चलो… -अनंत संभाजी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *