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खुद को जाने बिना परमात्मा को नहीं जान सकते - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
खुद को जाने बिना परमात्मा को नहीं जान सकते

खुद को जाने बिना परमात्मा को नहीं जान सकते

जीवन-प्रबंधन
  • परमात्मा का परिचय नहीं होने से उन्हें याद करते समय भागता है मन

शिव आमंत्रण, आबू रोड। हमें परमात्मा को याद करने के लिए कोई अलग समय या विधि कि आवश्यकता नहीं है, उन्हें हम चलते-फिरते कर्म करते कभी भी याद कर शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। जिस क्षण उन्हें याद करेंगे उसका स्थिति हमारी स्थिति पर आ जाएगी। जैसे ही हमारी स्थिति स्टेबल हो जाएगी हम जो कर्म करेंगे वो ऑटोमैटिक अच्छी होगी। फिर हमें शुद्ध विचार, अच्छे शब्द के लिए मेहनत और दिखावटी बिहेवियर करना नहीं पड़ेगा वो अपने आप होता जाएगा। क्यों ऐसा होता है जब हम भगवान को याद करने बैठते हैं तो मन इधर- उधर जाता है? हम सारा दिन में कितने लोगों को याद करते हैं, यहां बैठे आप अपने बच्चे को याद कर सकते हैं, फोटो सामने चाहिए? याद अपने आप आएगी, जिनके साथ हमारा रिश्ता है उनको याद करना नहीं पड़ता, उनकी याद ऑटोमैटिक ली आती है। भगवान को याद करने बैठते हैं टाइम भी निकालते हैं तैयारी भी करते हैं लेकिन याद करने बैठते हैं तो किसी और की याद आ जाती है। क्योंकि हमें उसका परिचय नहीं था। हमारा उसके साथ रिश्ता नहीं था, अब हमें उसका परिचय मिला कि जैसे हम आत्मा वैसे वो भी आत्मा है। परमात्मा मतलब जो हमारी सात क्वालिटी हैं, वे सात क्वालिटी में वो परम है। परमधाम के निवासी हैं परमात्मा वो कहां का रहने वाला है? परमधाम का रहने वाला है। अब जब हमें उसे याद करना है तो उसको परमधाम में और वो क्वालिटी के साथ याद करना है और उसको याद करने से पहले ख़ुद किस स्थिति में बैठना है कि जो मैं कौन हूं ? अगर आप इस भान में हैं कि आप डॉक्टर हैं तो मरीज याद आएगा। मैं आत्मा तो परमात्मा याद याद आएगा, इसलिए खुद को बिना जाने खुदा को नहीं पहचान सकते हैं।

फिर परमात्मा को याद नहीं करना पड़ेगा :- जब मंदिर में जाते हैं तब सबसे पहली चीज क्या करते हैं? पहले चप्पल उतारते हैं चप्पल उतारना माना चमड़ी बाहर उतारो। सभी लेदर प्रोडक्ट्स, आउटसाइड, मतलब चमड़ी, ईगो बाहर। तिलक लगाना अर्थात् मैं आत्मा। अब भगवान को याद करो।लेकिन हमने वो सारी चीजें फिजिकल में करनी शुरू कर दी। चप्पल बाहर, तिलक मस्त पर और फिर भगवान को याद करना।सबसे पहले मैं आत्मा, अब मैं आत्मा को परमात्मा को याद करना नहीं पड़ेगा, याद ऑटोमैटिक ली आएगी। जैसे परमात्मा की याद आएगी वो एनर्जी से हम जुड़ जाएंगे, हमारी स्थिति जो सात ओरिजिनल संस्कार प्ले करने शुरू हो जाएंगे। अगर हम पूजा कर रहे हैं, लेकिन उस टाइम सर्जरी को याद कर रहे हैं तो हमारी चार्जिंग नहीं हो रही। लेकिन हम सर्जरी कर रहे हैं और उस टाइम भगवान को याद कर रहे हैं तो हमारी चार्जिंग हो रही है। अब वो चार्जिंग जब होगी तो उसका बेनिफिट किसको होगा एनर्जी कहां डाउनलोड होगी? आत्मा पर डाउनलोड होगी। हमारी स्थिति कैसी हो जाएगी और जैसे ही हमारी स्थिति होगी वो एनर्जी हमारे कर्म में वाइब्रेट हो जाएगी। अब अगर परमात्मा को याद करते हुए सर्जरी कर ली तो वो सर्जरी कैसी हो जाएगी।अंतर फील होगा। सर्जरी वैसे भी परफेक्ट होती है आपकी लेकिन कभी-कभी थोड़ा सा डर आ जाता है। घबराहट के साथ तनाव क्रियेट हो जाता है। कभी कोई उलझन आ जाती है तो उस समय उन बातों का असर मन पर पड़ता है, लेकिन अगर मन भगवान के साथ कनेक्टेड है और वो एनर्जी डाउनलोडेड है, तब क्राइसिस आएगा भी तो मन की स्थिति कैसी होगी? तब हम क्या करेंगे उस एनर्जी को अपने कर्म में यूज करना शुरू कर देंगे।

बच्चे! मैं बैठा हूं मुझे यूस करो…

परमात्मा हमें मुरली में एक बहुत सुंदर लाइन कहते हैं- बच्चे! मैं बैठा हूं मुझे यूस करो। परमात्मा की शक्ति को कैसे यूज कर सकते हैं और किन-किन चीजों में यूज कर सकते हैं? आज दिन तक जब हम भगवान को याद करते थे तो या तो हम उससे अपनी जीवन की कोई छोटी बड़ी बातें मांग लेते थे क्योंकि हमें लगता था सबकुछ उसकी मर्जी से हो रहा है तो उसको कह देंगे तो वो काम हो जाएगा। अगर हम भगवान से एक नई कार मांगें क्या वो हमें दे सकता है? परमात्मा सर्वशक्तिमान है, शांति का सागर है, पवित्रता का सागर, प्यार का सागर है, लेकिन उससे हम शक्ति लेकर अपनी शक्ति को बढ़ाकर हम ऐसे काम कर सकते हैं कि फिर हम गाड़ी खरीद सकते हैं, लेकिन परमात्मा को कहना कि मेरा कर्म ठीक कर दो ये होगा नहीं। आत्मा किसने देखी है? आत्मा की ही स्थिति तो सारा दिन अनुभव कर रहे हैं। शांति, प्यार, शक्ति ये आत्मा का ही तो स्वरूप है। लेकिन आज हमारी स्थिति क्या है? तनाव, चिंता, परेशानी, निराशा ये सब आत्मा ही है। आत्मा ही ये सब महसूस कर रही है तो जैसे कि शरीर स्वस्थ होता है तो कैसा होता है और शरीर कमजोर होता है तो कैसा होता है? जब आत्मा स्वस्थ होती है तो आत्मनिर्भर होती है, लेकिन आत्मा जब कमजोर होती है तो वो छोटी-छोटी बातों में परेशान होती है। उदास होती है, हार मान जाती है हमारे जीवन का ये लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे हर संकल्प, बोल और कर्म में मुझे आत्मा की शक्ति केवल बढ़ती रहे। आत्मा सशक्त होती जाए, कोई ऐसा कर्म न करें जिससे आत्मा की शक्ति घटे। क्योंकि अगर आत्मा की शक्ति घटी तो बाहर सबकुछ तो पा लेंगे लेकिन खुशी और वो सुख, प्यार और शांति अभी भी ढूंढते रहेंगे क्योंकि आत्मा कमजोर हो गई हैं।

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