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हिम्मत कभी बताई नहीं जाती बल्कि दिखाई जाती है - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
हिम्मत कभी बताई नहीं जाती बल्कि दिखाई जाती है

हिम्मत कभी बताई नहीं जाती बल्कि दिखाई जाती है

शख्सियत

व्यक्ति जब ढ़ृढ़ता की शक्ति से कोई भी मंजिल तक पहुंचने का लक्ष्य बना लेता है तो वह माउंट एवरेस्ट जैसी विशालकाय चोटी तक एक निश्चित समय में पहुंचकर दिखा ही देता है। परन्तु यदि ढ़ृढ़ता के साथ परमात्म शक्ति ईश्वरीय प्रेम साथ में हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। ऐसे ही एक साहसी व्यक्तित्व मुजफ्फरपुर बिहार के 52 वर्षीय दिग्विजय शाही हैं जो कि मुजफ्फरपुर से माउंट आबू राजस्थान 1600 किलोमीटर की दूरी मात्र 13 दिनों में एक पुरानी साइकिल से तय कर ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के हेडक्वाटर पहुंचे। पहुंचने का मकसद बस एक ही था परमात्मा से मिलन। ब्रह्माकुमारीज संस्थान के अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय पहुंचकर उन्होंने शिव आमंत्रण से खास बातचीत कर अपना अनोखा अनुभव बताया-

ऐसा लग रहा था शिवबाबा मुझे मधुबन बुला रहे हैं जाना ही पड़ेगा- दग्विजय शाही मुजफ्फरपुर बिहार के रहने वाले एक किसान हैं। पिछले चालीस साल से परमात्मा शिव बाबा से मिलने के लिए गहन भक्ति करते रहे हैं। पढ़ें उन्हीं के शब्दों में…..एक दिन मुझे पता चला कि जिस शिव बाबा को लोग पूजा करते हैं उसी शिव बाबा को ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान भी मानती है। क्यों नहीं जाकर वहां समझा जाए कि वहां क्या मान्यता है? हमारे घर से तीन किलोमीटर दूरी पर ही ब्रह्माकुमारीज़ का तुर्की सेवाकेंद्र है। वहां पहुंचकर वहां की संचालिका बीके पुष्पा बहन से मिला। उन्होंने मुझे परमात्मा के बारे में विस्तार से बताया। जब वो बता रही थी तभी मैं ध्यान में चला गया। मैंने देखा कि शिव बाबा ऊपर से नीचे आए और मुझे बोले आओ मेरे बच्चे मेरे गोद में आओ। फिर जब मैं ध्यान से नीचे आया तो मैंने ठान लिया कि अब मुझे परमात्मा के बताये मार्ग पर ही चलना है। इसके बाद मैं प्रतिदिन ब्रह्माकुमारीज संस्थान में आने लगाा और रोज मुरली महावाक्य सुनने लगा। इसके बाद जब मुझे मधुबन के बारे में पता चला तो प्रतिदिन बाबा से कहने लगा कि बाबा मुझे मधुबन बुलाओ। इसके बारे में दीदी से बोला तो उन्होंने कहा कि जब मैं मधुबन चलूंगी तो ले चलूंगी। उन्होंने सफेद कपड़े भी सिलवा कर दिए। उन्होंने कहा कि अभी भट्टी का टाइम है अभी भाई लोग नहीं जाएंगे, आप आगे जनवरी में चलना। लेकिन तत्काल उनके मना करने के बावजूद भी मैं उनसे बोला कि शिवबाबा मुझे मधुबन बुला रहे हैं जाना ही पड़ेगा।

हर वक्त परमात्मा की उपस्थिति का एहसास होता है…

मैं जोन इंचार्ज बीके रानी दीदी से मुलाक़ात किया उनसे राखी बंधवाया और मैंने बोला दीदी हम बाबा के पास मधुबन जाएंगे उन्होंने कहा कि हां आप जाओगे। परमात्मा की कृपा से मेरा तीन कट्टा ज़मीन ब्रह्माकुमारीज़ सेवाकेंद्र खोलने के लिए सफल हो पाया जो कि मेरे लौकिक घर के पास में ही है। मैंने सब शिवबाबा पर सौंप दिया कि कैसे इस जमीन पर सेवाकेंद्र खुलेगा, कैसे सुंदर मकान बनेगा? मैंने संकल्प कर शिव बाबा से कहा कि बाबा मधुबन जैसा ही इसे छोटा मधुबन बनाना। बाबा ने मुझे प्रेरणा दी और कहा कि ठीक है सब हो जाएगा। मुझे हर वक्त परमात्मा दिखायी देता है और उसका पूरा साथ मिलता है। मैं कहीं भी जाता हूं मुझे कोई तकलीफ नहीं होती है। भल लोग मेरे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें। अपनी मन की स्थिति अचल अडोल बनाये रखता हूं। जिससे परेशान होने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है।

बाबा मेरे अंदर एक गजब सी शक्ति भर देता था…

एक दिन मैं बड़ी दीदी से इजाजत लेकर मुजफ्फरपुर से माउंट आबू करीब 1600 किलोमीटर साइकिल से आने का संकल्प किया। उसके बाद मैंने यात्रा आरंभ कर शिव बाबा को संकल्प से भृकुटी सिंहासन पर बिठाकर ब्रह्मा बाबा को साइकिल का हैंडल पकड़ाया और निकल पड़ा। मैं यही सोचकर साइकिल चला रहा था कि ये साइकिल नहीं पुष्पक विमान हो गया है प्रभू अब ले चलो मधुबन। बाबा बिल्कुल वैसा ही किए। रास्ते में जब कहीं पर चढ़ाई आती थी तो वहां पर परमात्मा गजब की शक्ति भर देता था। कई जगह पहाड़ आये पर बाबा साइकिल तब लगता था कि मेरी साइकिल का पैडल खुद परमात्मा मार रहा है। यह मेरे जीवन का बहुत ही अद्भुत अनुभव था। मैं ऊपर देखते हुए शिवबाबा से शक्ति लेता चला आ रहा था और नीचे सकाश रूप में भी सबको देता आ रहा था। पहाडी़ जब पार किए तो उससे पहले गुफा थी उस गुफा के पास कई लोग मेरा फ़ोटो क्लिक कर रहे थे और गुफा से पार करते भी हम एक ही हाथ से साइकिल चलाते पार कर गये।

ईश्वरीय मर्यादाओं से ही मिलती है परमात्मा की मदद…

ईश्वरीय नियमों के अनुसार मैंने ब्रह्माकुमारीज़ सेवाकेंद्र से ईश्वरीय आदेश पत्र ना लेने की भूल की। जिसके कारण मुझे ब्रह्माकुमारीज़ सेवाकेंद्रो पर ठहरने की इजाजत नहीं मिलती थी। एक दो सेवाकेंद्र पर जाने के बाद जब ठहरने को नहीं मिला तब मैं रास्ते में मंदिर, स्कूल जैसे स्थानों पर थोड़ा आराम करने का फैसला किया। भूख लगने पर फल खरीद कर खा लेता था। लेकिन मुझे बाबा पर पूरा विश्वास था कि भल सेंटर का गेट बंद हो गया मेरे लिए, लेकिन मेरे बाबा के दिल का गेट हमेशा खुला है। सेवाकेंद्र के भाई-बहनों के इस व्यवहार से मैं थोड़ा भी निगेटिव सोच नहीं लाया। मैंने हमेंशा सकारात्मक तरीके से यही सोचा कि उन लोगों ने मेरे साथ ठीक ही किया जो मुझे ब्रह्माकुमारीज़ सेवाकेंद्र पर ठहरने नहीं दिया। मेरे पास तो कोई लेटर सबूत है नहीं फिर हमें ये लोग क्यों ठहरने दें? हमारे तरह तो कोई भी गलत आदमी भी वेश बदल कर आश्रम पर ठहरने का बहाना कर सकता है। जैसे रावण ने वेश बदलकर साधु के रूप में ही तो सीताजी का अपहरण किया था। सीताजी मर्यादा की लकीर से बाहर आयी तभी तो उन्हें बुरे दिन देखने पड़े इसलिए ये लोग सीताजी की तरह ईश्वरीय नियमों को नहीं तोड़ा जिसके कारण मैं अति प्रसन्न हूं।

शान्तिवन आकर मुझे यही लगा कि यही मेरा असली घर है…

साइकिल चलाते आगे बढ़ते गए तब एक हनुमान जी का मंदिर था वहां मैंने दो सेब का भोग लगाकर बांटकर खाया। वहां का जो पुजारी था वो कहने लगा अरे यह तो बाबा है बाबा। इस तरह थोड़ा-थोड़ा आराम करते हुए 13 दिनों की यात्रा कर 9:30 रात में मैं शांतिवन आबूरोड पहुंचा। उसी टाइम से आराम करने के बजाय मैं सेवा में लग गया। शान्तिवन आकर के मुझे यही लगा कि यही मेरा असली घर है। यहां मुझे बहुत अच्छा फ़ील होता है, मैं बहुत ख़ुश हूं। दुनिया में सब बोलते कि स्वर्ग ऊपर है लेकिन यहां देखकर मुझे लगा स्वर्ग ऊपर नहीं यही है। एक बहन जिन्होंने मुझे अपने सेवाकेंद्र पर ठहरने नहीं दिया उन्हें जब पता चला कि मैं शांतिवन पहुंच गया हूं तब वे मुझसे मिलकर बहुत आश्चर्यचकित हुई और उन्होंने मेरे लिए शांतिवन में रहकर सेवा करने के लिए 6 महीने का आदेश रूपी पत्र लिखकर दी। उन्होंने कहा कि आप 6 महीने बाद भी जितना दिन रहना चाहें उतना दिन रह सकते हो यहां। मैं फिलहाल इस हेडक्वार्टर के ब्रेड विभाग में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। बाबा जब तक मेरे से होने वाली सेवाएं लेते रहेंगे मैं देता रहूंगा।

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