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दिव्यता दिवस पर अव्यक्त लोक का लोकार्पण - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
दिव्यता दिवस पर अव्यक्त लोक का लोकार्पण

दिव्यता दिवस पर अव्यक्त लोक का लोकार्पण

मुख्य समाचार
  • भारतीय नौसेना के उपप्रमुख वॉइस एडमिरल एसएन घोरमडे ने अपने आध्यात्मिक अनुभव किए सांझा
  • परमात्मा से कामना है कि जल्द विश्व में शांति हो, यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध समाप्त हो: भारतीय नौसेना उपप्रमुख घोरमड
Dedication of avyakt lok on divinity day
ब्रह्माकुमारीज़ की पूर्व मुख्य प्रशासिका दादी हृदयमोहिनी की प्रथम पुण्य स्मृति पर हजारों लोगों ने अर्पित किए

शिव आमंत्रण, आबू रोड। ब्रह्माकुमारीज की पूर्व मुख्य प्रशासिका दादी हृदयमोहिनी (दादी गुलजार) की स्मृति में नवनिर्मित स्मृति स्तंभ अव्यक्त लोक का दादी की प्रथम पुण्यतिथि दिव्यता दिवस पर शुक्रवार को लोकार्पण किया गया। सुबह 8 बजे सबसे पहले संस्थान की मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी, अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका बीके मोहिनी, सचिव बीके निर्वैर भाई, संयुक्त मुख्य प्रशासिका बीके मुन्नी दीदी द्वारा दादी गुलजार को पुष्पांजली अर्पित की गई। इसके बाद अन्य वरिष्ठ भाई-बहनों सहित देशविदेश से आए हजारों भाई-बहनों ने अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। यह सिलसिला दिनभर चलता रहा। बता दें कि 11 मार्च 2021 को ब्रह्माकुमारीज की पूर्व मुख्य प्रशासिका दादी हृदयमोहिनी का मुंबई के सैफी हॉस्पिटल में देवलोकगमन हो गया था। दिव्यता दिवस पर दादीजी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में कई पुरस्कारों से सम्मानित भारतीय नौसेना के उपप्रमुख वॉइस एडमिरल एसएन घोरमडे ने कहा कि आज ब्रह्माकुमारीज संस्थान के इस अंतरराष्ट्रीय मंच से मैं यही कामना करता हूं कि जल्द विश्व में फिर से शांति हो। यूक्रेन और रूस के बीच रहा युद्ध जल्द समाप्त हो। जब यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू हुआ तो इस दौरान मुझे रशिया जाने का मौका मिला तो मैंने वहां भी परमात्मा से शांति की कामना की। मेरी यही शुभभावना है कि जल्द से जल्द दोनों देशों में शांति हो और युद्ध समाप्त हो। जिस तरह ब्रह्माकुमारीज संस्था विश्व शांति को लेकर कार्य कर रही है, निश्चित ही एक दिन वह अपने मिशन में सफल होगी। नौसेना उपप्रमुख घोरमडे ने कहा कि वर्ष 2011 में मुझे पहली बार माउंट आबू आने का मौका मिला।

इसके बाद मैंने ब्रह्माकुमारीज में सिखाए जाने वाले राजयोग मेडिटेशन का कोर्स किया। तब से लेकर मैं नियमित सुबह 4 बजे से राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास करता हूं। साथ ही नियमित आध्यात्मिक सत्संग (मुरली क्लास) अटेंड करता हूं। मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे दादी गुलजार जी से मिलने का मौका मिला। जब भी दादीजी से मिलता तो एक अलग ही दिव्य अनुभूति होती थी। दादीजी कहती थीं कि सदा खुश रहो और खुशी बांटो। सदा सभी को खुशी की मिठाई खिलाओ। राजयोग मेडिटेशन के नियमित अभ्यास से मेरी कार्य क्षमता बढ़ गई है। आध्यात्मिक पथ पर चलने से मेरा जीवन बहुत ही संयमित और आनंददायक हो गया है। संस्थान के सचिव बीके निर्वैर भाई ने कहा कि दादीजी का जीवन लाखों भाईबहनों के लिए मिसाल था। न्यूयार्क में ब्रह्माकुमारीज की निदेशिका व संस्थान की अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका बीके मोहिनी दीदी ने कहा कि दादीजी का एक-एक कर्म उदाहरणमूर्त था।

दादी रतनमोहिनी जी माल्यार्पण करते हुए
अव्यक्त लोक का लोकार्पण का साक्षी बनेू असंख्य ब्रह्मावत्स

दादीजी बहुत ही नम्रचित्त थीं: डॉ.निर्मला
माउंट आबू स्थित ज्ञान सरोवर अकादमी की निदेशिका डॉ. निर्मला दीदी ने कहा कि दादी गुलजार बहुत ही नम्रचित्त थी। बाबा का जो भी आदेश होता था तो तुरंत उसे करने में जुट जाती थीं। बाबा का कहना और दादी का करना। यह दादी के जीवन का मूलमंत्र रहा। लंदन में ग्लोबल को-ऑपरेशन हाऊस की निदेशिका बीके जयंती दीदी ने कहा कि दादीजी ने ताउम्र परमात्मा का संदेशवाहक बनकर अथक सेवाएं कीं। दादीजी ने अपना सारा जीवन विश्व की सेवा में लगा दिया। रशिया के सेवाकेंद्रों पर सेवाएं दे रहीं बीके सुधा दीदी, डॉ. अशोक मेहता, बीके चार्ली भाई ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच संचालन रशिया के सेवाकेंद्रों की निदेशिका बीके संतोष दीदी ने करते हुए दादीजी के साथ के अपने अनुभव को सांझा किया।

डॉक्टर शुक्ला- दादी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं देखी
दादी गुलजार का मुंबई में इलाज करने वाले डॉ. आकाश शुक्ला ने कहा कि जब पहली बार दादीजी से मिला तो ऐसा अनुभव हुआ कि मैं एक दिव्य आत्मा से मिल रहा हूं। दादी से मिलने के बाद मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया। मैंने दादीजी को देखा कि उनमें गजब का संयम, धैर्य था। जब भी मैं दादी को देखने जाता था तो वह इंतजार करते हुए मिलती थीं। कई दादी ने यह नहीं कहा कि आप लेट क्यों आए। मैं तीन साल में दादी के इलाज के दौरान कम से कम तीन सौ बार मिला। इस दौरान मात्र दादी ने दो सौ शब्द ही बोले थे। कम बोलो, धीरे बोले और मीठा बोलो इस महावाक्य की दादी साक्षात जीती जागती मिसाल थीं। दादी की अपने शरीर के ऊपर पूरा नियंत्रण रहता था। इतने कष्ट के बाद भी दादी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं देखी। वह हमेशा शांत रहती थीं। डॉ. रवि गुप्ता ने कहा कि मैंने दादीजी को बिना एनेस्थेसिया दिए एंडोस्कोपी की। यह मेरे जीवन का पहला अनुभव था। उस दिन मुझे बहुत ही दिव्य अनुभूति हुई।

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