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हर नारी बन सकती है दुर्गा की अवतार……… - Shiv Amantran | Brahma Kumaris
हर नारी बन सकती है दुर्गा की अवतार………

हर नारी बन सकती है दुर्गा की अवतार………

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वर्तमान समय देश की बेटियों पर हो रहे आसुरी प्रवृत्तियों का प्रहार और नकारात्मक गिद्ध दृष्टि से बचाने के लिए प्रत्येक बेटी की पालना दुर्गा, काली और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसी करने की जरुरत है। ऐसे में आ रहा नवरात्रि का पर्व काफी अहम है। हर नारी में दुर्गा का रुप है। दुर्गा पूजा और नवरात्रि भारत देश में मनाये जाने वाले सभी पर्वों में सबसे शक्तिशाली और पवित्रता पूर्ण माना गया है। नवरात्रि के समय पूरे नौ दिन तक नौ देवियों की पूजा अर्चना होती है। तथा भक्त नौ दिनों तक व्रत रखते है। चाहे वह कोई भी हो। नर हो या नारी हर कोई नवरात्रि की उपासना करता है। इसमें मॉं दुर्गा को असुरों की संहारिनी के रुप में दिखाया गया है। तथा शेर की सवारी के साथ भक्तों की मनोकामना पूर्ण के साथ असुरों का वध करने वाली है। ऐसी मान्यता है कि देवियों के अन्दर कोई भी अवगुण नहीं होता है। सभी दैवी गुणों से भरपूर होती है। या यूं कहें कि दुर्गुणों का नाश करने वाली ही दुर्गा और काली है । तो आईये जानते है कि नौ दिनों तक पूजी जाने वाली नौ देवियों का आध्यात्मिक महात्म्य क्या है और कैसे उनकी पूजा की जाती है।

दुर्गा अथवा शैलपुत्री: नवरात्रि का पहला दिन दुर्गा की पूजा होती है। मॉं दुर्गा को शैलपुत्री के
नाम से भी जानी और पूजी जाती है। दुर्गा को शिव- शक्ति कहा जाता है। जब परमात्मा को याद करेंगे तो जीवन में सामना करने की शक्ति, निर्णय, सहन और सहयोग करने इत्यादि अष्ट शक्तियां प्राप्त होती हैं। इसलिए दुर्गा को अष्ट भुजा दिखाते हैं।

ब्रह्मचारिणी: नवरात्र का दूसरा दिन देवी ब्रह्मचारिणी का है, जिसका अर्थ है- तप के साथ श्रेष्ठ
आचरण करने वालीं। तप का आधार पवित्रता होता है, जिसके लिए जीवन में ब्रह्मचर्य की धारणा करना आवश्यक है। इस देवी के दाहिने हाथ में जप करने की माला और बाएं हाथ में कमण्डल दिखाया जाता है।

चंद्रघण्टा: नवरात्र के तीसरे दिन देवी चन्द्रघंटा के रूप में पूजा की जाती है। पुराणों की मान्यता है कि असुरों के प्रभाव से देवता काफी दीन-हीन तथा दु:खी हो गए, तब देवी की आराधना करने लगे।
फलस्वरूप देवी चंद्रघण् प्रकट होकर असुरों कासंहार करके देवताओं को संकट से मुक्त किया। इस
देवी के मस्तक पर घण्टे के आकार का अद्र्धचंद्र, 10 हाथों में खड्ग, शस्त्र, बाण इत्यादि धारण किये दिखाये जाते हैं। चंद्रघण्टा देवी की सवारी शक्ति का प्रतीक सिंह है जिसका अर्थ है- शक्तियां (देवियां) अष्ट शक्तियों के आधार से शासन करती हैं।

कुष्माण्ड: नवरात्र के चौथे दिन देवी कुष्माण्ड के रूप में पूजा की जाती है। कहा जाता है कि यह खून पीने वाली देवी है। कलि पुराण में देवी की पूजा में पशु बलि का विधान है। इसी मान्यता के आधार पर देवियों के स्थान पर बलि-प्रथा आज भी प्रचलित है। वास्तव में, हमारे अन्दर जो पशुओं से भी बदतर स्वभाव की क्रुरता है। उसे समाप्त करने का प्रतीक है कुष्माण्ड देवी।

स्कन्द माता: नवरात्र के पाँचवें दिन देवी स्कन्द माता के रूप में पूजा की जाती है। कहते हैं कि यह ज्ञान देने वाली देवी है। इनकी पूजा करने से ही मनुष्य ज्ञानी बनता है। यह भी बताया गया है कि स्कन्द माता की पूजा ब्रह्मा, विष्णु, शंकर समेत यक्ष, किन्नरों और दैत्यों ने भी की है।

कात्यायनी: नवरात्र के छठवें दिन देवी कात्यायनी के रूप में पूजा की जाती है। महिषासुर दानव का वध जिस देवी ने किया था, उस देवी का प्रथम पूजन महर्षि कात्यायन ने किया था और इस कारण ही वह देवी कात्यायनी कहलाई। इनका वाहन सिंह दिखाया जाता है। अर्थात दानवी प्रवृत्ति का वध करना ही कात्यायनी का प्रतीक है।

कालरात्रि: नवरात्र के सातवें दिन देवी कालरात्रि के रूप में पूजा की जाती है। इनके शरीर का रंग काला और सिर के बाल रौद्र रूप में बिखरे हुए दिखाये जाते हैं। इनका वाहन गधे को दिखाया गया है जिसका अर्थ है कि कलियुग में एक सामान्य गृहस्थ की हालत प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए गधे जैसी हो जाती है और जब वह गधा अपने मन -बुद्धि में कालरात्रि जैसी देवी को बैठा लेता है तो उससे मुक्ति दिलानी ही कालरात्रि का प्रतीक है।

महागौरी: नवरात्र के आठवें दिन देवी महागौरी के रूप में पूजा की जाती है। कहते हैं कि कन्या रूप में यह बिल्कुल काली थी। शंकर से शादी करने हेतुअपने गौरवर्ण के लिए ब्रह्मा की पूजा की, तब ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उसे काली से गौरी बना दिया। अर्थात मनुष्य जब स्वभाव से काला बन जाता है तब मनुष्य के काले संस्कार मिट जाते हैं।

सिद्धिदायी: नवरात्र के नौवें दिन देवी सिद्धिदायी के रूप में पूजा की जाती है। कहा गया है कि यह
सिद्धिदायी वह शक्ति है जो विश्व का कल्याण करती है। जगत का कष्ट दूर कर अपने भक्तजनों को मोक्ष प्रदान करती है।

हर नारी दुर्गा बन दुर्गुणों का करे नाश इन नौ देवियों के रुप और कत्र्तव्य अतीत में हुए दिव्य कर्मों के यादगार है। जब इस सृष्टि पर आसुरी प्रवृत्तियां हावी हो जाती है। तब परमात्मा शिव अवतरित होकर प्रत्येक नारी को दुर्गुणों को मिटाकर दुर्गा समान बनाते है। जब नारी अपने अन्दर के दुर्गुणों को मिटाकर सदगुण धारण करती है तब वह लक्ष्मी, सरस्वती जैसा बन जाती है। इसलिए प्रत्येक नारी दुर्गा का रुप होती है बशर्तें वह अपने जीवन से बुराईयों को समाप्त कर दे। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में ब्रह्माकुमारी प्रत्येक नर और नारी को दुर्गा, नारायण ओर लक्ष्मी जैसा बनाने की शिक्षा दे रही है। इस नवरात्रि पर्व पर दुर्गा बन दुर्गुणों का नाश करे तथा पांच बुराईयों के प्रतीक रावण का दहन करें।

देवियों जैसा बनने की सीखी इंजिनियरी

जब मैं 10वीं कक्षा में पढ़ती थी तब मुझे ब्रहकुमारी बहनों द्वारा सजाये जाने वाले चैतन्य देवियों की झांकी में देवी बनने का अवसर मिला। और इस प्रकार से मैं प्रतिवर्ष देवी बनने लगी। लेकिन खास बात यह थी कि जब भी मैं थोड़े समय के लिए देवी बनती थी तो मुझे अन्दर से दुर्गा जैसी शक्ति का एहसास होने लगता था। ऐसा लगता था कि जब तक मैं देवी के रुप में रहती हूॅं तब तक मेरे विचारो में अद्भूत परिवर्तन आ जाता है। फिर मुझे ये संकल्प आता कि यदि थोड़े समय के
लिए देवी बनती हूॅं तो इतना अच्छा अनुभव होता है, अगर मैं सचमुच देवी की तरह बन जाउं तो कितना अच्छा जीवन हो जायेगा। फिर मैंने ब्रह्माकुमारी बहनों से इस बारे में बात की तब उन्होंने सच्ची देवी बनने का अर्थ बताया और कहा कि दुर्गुणों को नाश करने वाली ही दुर्गा है। फिर मैंने यह सोच लिया कि अब यह जीवन दुर्गा और सरस्वती जैसा बनने में लगाना है। फिर मैं ब्रह्माकुमारीज संस्थान में नियमित जाने लगी और जीवन पूरी तरह बदल गया। पढ़ाई भले ही मैंने साफटवेयर इंजिनियरी की है। लेकिन जीवन की इंजिनियरी पूरी तरह समझ में आ गयी और सेवाकेन्द्र में समर्पित हो गयी।
ब्रह्माकुमारी चित्रलेखा, राजयोग शिक्षिका,
ब्रह्माकुमारीज चौबे कालोनी, रायपुर

देवियों से जैसा बनने की ललक से बनी ब्रह्माकुमारीज

जब मैं पहली बार दीपावली के पावन पर्व पर मुझे ब्रह्माकुमारीज संस्थान में देवी महालक्ष्मी के स्वरूप में मुझे झाँकी में बिठाया गया। उस वक्त मेरी उम्र मात्र 12 वर्ष थी। तब मेरे मन में यह संकल्प चलने लगा कि आखिर लक्ष्मी, दुर्गा कैसे बना सकता है। कई दिनों तक मेरे मन में यह जिज्ञासा बढऩे लगी। फिर ब्रह्माकुमारी बहनों को देखा उनका श्वेत वस्त्रों में बिल्कुल देवियों की तरह लग रही थी। फिर मैने ब्रह्माकुमारीज दीदियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हॉं प्रत्येक नारी दुर्गा और लक्ष्मी जैसी बन सकती है। परन्तु इसके लिए जीवन में दैवी गुणों को धारण करना पड़ेगा। फिर दीदी घर आयी और पिताजी से बोली कि मुझे एक सौगात चाहिए। तब पिता की आज्ञा से पहली बार ग्वालियर में महालक्ष्मी स्वरूप में देवी बनना हुआ। इसके पहले मैंने कभी ऐसी कोई चैतन्य झाँकी देखी भी नहीं थी। झाँकी के दौरान बहन जी ने जो देवियों का रहस्य समझाया उस रहस्य को सुनकर मुझे ऐसा लगा कि मुझे भी अब ऐसा दैवी जीवन जीना है। इस प्रकार मेरा इस आध्यात्मिक मार्ग मे प्रवेष हुआ। तभी से हर नवरात्री पर देवी बनने की श्रृखंला षुरू हुई। अलग अलग स्थानों में वा अलग-अलग रूपों में देवी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
ब्रह्माकुमारी रमा, राजयोग शिक्षिका, छतरपुर

मुझे लगा मैं सचमुच में देवी हूॅं

वैसे तो मुझे ब्रह्माकुमारीज संस्थान का ज्ञान सुनने की इच्छा नहीं होती थी। परन्तु एक बार बहन जी ने बुलाया और कुछ देवियों की फोटो दिखाई और कहा कि आपको झांकी में ऐसी ही देवी बनना है, बनोगी। उस फोटो को देखकर मेरे मन में आकर्षण हुआ और मैने हॉं कह दिया। हमारे घर में कुछ किरायेदार रहते थे तो उनकी बेटियों के साथ हम 6 लोग देवी बने। जब मैं सजकर देवी की मुद्रा में बैठती थी तो लगता था कि मैं सचमुच में देवी हूॅ। दीदिया यह बताती थी कि परमात्मा की याद में बैठो और यह सोचो कि लोगों का दुख, दर्द दुर कर रही हूॅ। देवी मॉं मेरे द्वारा लोगों का कल्याण करा रही है। हजारों की संख्या में लोग आते और देवी की तरह देखते औरपूजा कर जाते। परन्तु हमारे प्रति किसी की गलत नजर नहीं जाती। मुझे लगा कि केवल मैं कुछ समय के लिए देवी बनकर बैठी हूॅं तो भी किसी की गलत नजर नहीं जा रही। यदि हमेशा के लिए बन जाउ तो फिर कैसा रहेगा। फिर अगले साल का पुन: समय आ गया और उस समय दीदी ने कहा कि अब देवी तभी बनाया जायेगा जब तुम खुद देवी जैसा बनने का प्रयास करोगी। फिर मैने ब्रह्माकुमारीज संस्थान में ज्ञान ध्यान प्रारम्भ कर दिया और पुन: देवी बनी, फिर क्या था आज मैं पूरी तरह देवी बनने का प्रयास कर रही हूॅ।
बीके आशा, राजयोग शिक्षिका, ब्रह्माकुमारीज, छतरपुर

विश्व कल्याण की भावना से बनी दुर्गा

वैसे तो मेरे माता पिता जी ब्रह्माकुमारीज संस्थान से जुड़े थे लेकिन मेरा रुझान नहीं था। एक दिन माताजी सेवाकेन्द्र ले गयी उन दिनों नवरात्रि चल रही थी। फिर दीदी ने कहा कि आप दुर्गा बन जाओ, फिर मैने मान लिया और दुर्गा बन गयी। जब मैं दुर्गा के रुप में बैठी तो महसूस हुआ कि कितने सारे लोग दर्शन के लिए आये हुए हैं। मेरी ही शक्तियां है मुझे इन्हीं से ही आगे बढऩा है। फिर बहनों ने कोर्स कराया और फिर मैं ब्रह्माकुमारी बन गयी। पढ़ाई पूरी होने के बाद तो मैं ब्रह्माकुमारीज संस्थान में समर्पित हो गयी।
बीके सरीता, राजयोग शिक्षिका, ब्रह्माकुमारीज असन्ध, हरियाणा

इस तरह नौ देवियों की आध्यात्मिक रहस्यों को धारण करना ही नवरात्रि पर्व मानना है। वर्तमान समय स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा इस कलियुग के घोर अंधकार में  माताओ -कन्याओं द्वारा सभी को ज्ञान देकर फिर से स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। परमात्मा द्वारा दिए गए इस ज्ञान को धारण कर अब हम ऐसी नवरात्रि मनायें जो अपने अंदर रावण अर्थात्‌ विकार है, वह खत्म हो जाये, मर जाये। यही है सच्चा-सच्चा दशहरा मानना। ऐसा दशहरा मनायें ,तब ही दीवाली अर्थात्‌ भविष्य में आने वाली सतयुगी दुनिया के सुखों का अनुभव कर सकेंगे। इसलिए हे आत्माओ ! अब जागो, केवल नवरात्रि का जागरण ही नहीं करो बल्कि इस अज्ञान नींद से भी जागो। यही सच्ची-सच्ची नवरात्रि मानना और जागरण करना  है । ऐसी नवरात्रि की आप सभी पाठकों को  शिव आमंत्रण पत्रिका की तरफ से ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

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